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ताड़मेटला नक्सली हमला केस : 76 जवानों की शहादत के आरोपी बरी, हाईकोर्ट ने खारिज की राज्य सरकार की अपील

ताड़मेटला नक्सली हमले (2010) में सीआरपीएफ के 76 जवानों की शहादत के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी है और निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए सभी आरोपियों को दोषमुक्त रखा है।

कीर्तिमान ब्यूरो
कीर्तिमान ब्यूरो
07 May 2026, 07:52 PM
📍 बिलासपुर

छत्तीसगढ़ के सबसे दर्दनाक नक्सली हमलों में शामिल ताड़मेटला कांड पर बड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है। इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ “संदेह से परे” ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने में पूरी तरह विफल रहा।

इस फैसले के बाद वर्ष 2010 के उस भीषण हमले की कानूनी लड़ाई एक बार फिर चर्चा में आ गई है, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे।

2010 का ताड़मेटला हमला

यह घटना 6 अप्रैल 2010 की है। सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन के उप कमांडर सत्यवान सिंह और अन्य सुरक्षा बल 4 अप्रैल से 7 अप्रैल तक सुकमा जिले के ताड़मेटला क्षेत्र में एरिया डोमिनेशन पेट्रोलिंग पर थे।

जैसे ही सुरक्षा बल ताड़मेटला गांव के घने जंगलों में पहुंचे, नक्सलियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। अचानक हुई भारी गोलीबारी और विस्फोटों में स्थिति बेहद भयावह हो गई।

सुरक्षा बलों ने भी आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई की, लेकिन इस मुठभेड़ में 76 जवान शहीद हो गए। इस हमले को देश के सबसे बड़े नक्सली हमलों में से एक माना जाता है।

मामला दर्ज हुआ, लंबी चली सुनवाई

घटना के बाद थाना चिंतागुफा में मामला दर्ज किया गया और जांच शुरू हुई। पुलिस ने कई लोगों को आरोपी बनाते हुए गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया, जिनमें शामिल थे—

  • आईपीसी की धारा 148, 120बी, 396
  • आर्म्स एक्ट की धारा 25 और 27
  • विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3 और 5

विशेष अदालत (दक्षिण बस्तर) ने 7 जनवरी 2013 को इस मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में असफल रहा।

इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट का फैसला

डिवीजन बेंच ने सुनवाई के बाद स्पष्ट कहा कि इतने गंभीर मामले में भी अभियोजन पक्ष ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि—

  • किसी भी आरोपी की प्रत्यक्ष पहचान किसी गवाह ने नहीं की
  • फॉरेंसिक और तकनीकी साक्ष्य अधूरे पाए गए
  • जांच में कई प्रक्रियात्मक खामियां रहीं
  • विस्फोटक सामग्री की पुष्टि करने वाली FSL रिपोर्ट भी पेश नहीं की गई

कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, चाहे मामला कितना भी गंभीर क्यों न हो।

महाधिवक्ता ने रखा था सरकार का पक्ष

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने दलील दी थी कि निचली अदालत ने महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी की। उन्होंने दावा किया कि कुछ अभियुक्तों के बयान और जब्त सामग्री मामले को मजबूत करते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि घायल जवानों को गवाह के रूप में पेश किया जाना चाहिए था, लेकिन अदालत ने उनकी गवाही स्वीकार नहीं की, जिससे मामला कमजोर हुआ।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: जांच में गंभीर खामियां

हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि—

  • महत्वपूर्ण गवाहों की पहचान नहीं की गई
  • वैज्ञानिक और फॉरेंसिक जांच अधूरी रही
  • आरोपियों को सीधे अपराध से जोड़ने वाले प्रमाण नहीं जुटाए गए

कोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह की गंभीर जांच में इतनी खामियां स्वीकार्य नहीं हैं।

जिन आरोपियों पर था केस, वे सभी बरी

इस मामले में जिन लोगों पर आरोप थे, वे अब सभी आरोपों से मुक्त हो गए हैं। इनमें शामिल हैं—

  • ओयामी गंगा
  • माडवी दुला
  • पोदियामी हिड़मा
  • ओयामी हिड़मा
  • कवासी बुथरा
  • हुर्रा जोगा
  • बरसे लखमा
  • मड़कम गंगा
  • राजेश नायक
  • करतम जोगा

इन सभी को निचली अदालत पहले ही बरी कर चुकी थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया है।

फैसले के बाद फिर उठा पुराना दर्द

इस फैसले के बाद ताड़मेटला हमले की यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं। जहां एक ओर सुरक्षा बलों की शहादत को लेकर भावनाएं गहरी हैं, वहीं अदालत के फैसले ने कानूनी प्रक्रिया और जांच प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

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