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भारत का  1000वां T-90 टैंक
भारत का 1000वां T-90 टैंक
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भारत : मेक इन इंडिया की बड़ी सफलता, भारत में बना 1000वां T-90

भारत ने रूस के आधुनिक T-90 मुख्य युद्धक टैंक का 1000वां यूनिट तैयार कर रक्षा उत्पादन में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। 2006 के भारत-रूस समझौते के तहत शुरू हुए इस प्रोजेक्ट में अब टैंकों के लगभग 80 प्रतिशत पुर्जे भारत में ही बनाए जा रहे हैं। भारतीय सेना पुराने T-72 टैंकों की जगह आधुनिक T-90 टैंकों को तैनात कर रही है, हालांकि यूक्रेन युद्ध में ड्रोन हमलों के बाद आधुनिक टैंक युद्ध की रणनीतियों पर नई बहस शुरू हो गई है।

प्रकाशित: 25 May 2026, 05:35 PM · अपडेट: 25 May 2026, 09:08 PM
वाशिंगटन
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
भारत ने अपनी सैन्य ताकत को और मजबूत करते हुए रूस के प्रसिद्ध T-90 मुख्य युद्धक टैंक का 1000वां यूनिट तैयार कर लिया है। यह उपलब्धि भारत के रक्षा उत्पादन और स्वदेशीकरण अभियान के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। तमिलनाडु के अवडी स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF) में तैयार किया गया यह टैंक भारतीय सेना की आधुनिक बख्तरबंद क्षमता को और मजबूत करेगा।  यह उपलब्धि केवल सैन्य उत्पादन का आंकड़ा नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती रक्षा आत्मनिर्भरता और तकनीकी क्षमता का प्रतीक भी है। लगभग दो दशकों में भारत ने न केवल बड़ी संख्या में T-90 टैंक तैयार किए हैं, बल्कि इनके निर्माण में स्वदेशी तकनीक और पुर्जों की हिस्सेदारी भी लगातार बढ़ाई है।

2006 में रूस के साथ समझौता

भारत और रूस के बीच 2006 में लाइसेंस प्राप्त उत्पादन समझौता हुआ था। इसके तहत भारत को T-90 टैंकों के घरेलू उत्पादन की अनुमति मिली थी। समझौते के अनुसार भारत में कुल 1,000 T-90 टैंकों का निर्माण किया जाना था। इस परियोजना के तहत पहला टैंक 2009 में बनकर तैयार हुआ था। शुरुआत में इन टैंकों के अधिकांश हिस्से रूस से आयात किए जाते थे, लेकिन समय के साथ भारत ने स्वदेशीकरण पर तेजी से काम किया। अब इन टैंकों में इस्तेमाल होने वाले लगभग 80 प्रतिशत पुर्जे भारत में ही बनाए जा रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह “मेक इन इंडिया” और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ी सफलता है।

1961 से सेना की व्हीकल्स फैक्ट्री

तमिलनाडु के अवडी में स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री 1961 से भारत की प्रमुख बख्तरबंद वाहन निर्माण इकाई रही है। यह फैक्ट्री लंबे समय तक सोवियत मूल के T-72 टैंकों का लाइसेंस आधारित उत्पादन करती रही। बाद में भारतीय सेना की जरूरतों को देखते हुए यहां T-90 टैंकों का निर्माण शुरू किया गया। फैक्ट्री ने वर्षों के दौरान उत्पादन क्षमता, तकनीकी दक्षता और स्वदेशीकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार अब भारत केवल टैंक असेंबल नहीं कर रहा, बल्कि इनके महत्वपूर्ण सिस्टम और कई एडवांस कंपोनेंट भी देश में विकसित किए जा रहे हैं।

T-90 टैंक

T-90 टैंक दुनिया के सबसे प्रभावशाली मुख्य युद्धक टैंकों में गिने जाते हैं। इन्हें अत्याधुनिक फायर कंट्रोल सिस्टम, नाइट विजन क्षमता, मिसाइल फायरिंग तकनीक और मजबूत कवच सुरक्षा के लिए जाना जाता है।भारतीय सेना में T-90 को “भीष्म” नाम दिया गया है। यह टैंक रेगिस्तान से लेकर अत्यधिक ठंडे इलाकों तक हर तरह के युद्ध क्षेत्र में प्रभावी माना जाता है। इसकी हाई मोबिलिटी और घातक मारक क्षमता इसे भारतीय सेना की सबसे महत्वपूर्ण युद्धक ताकतों में शामिल करती है।

T-72 टैंकों की जगह  T-90

भारतीय सेना के पास फिलहाल करीब 2,500 पुराने सोवियत युग के T-72 टैंक मौजूद हैं। हालांकि इन टैंकों को अब धीरे-धीरे आधुनिक T-90 टैंकों से बदला जा रहा है।सेना का मानना है कि भविष्य के युद्ध में बेहतर सर्वाइवल, एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स और आधुनिक हथियार प्रणाली वाले टैंकों की जरूरत होगी। इसी वजह से T-90 को भारतीय सेना की फ्रंटलाइन बख्तरबंद शक्ति के रूप में तेजी से तैनात किया जा रहा है।

यूक्रेन युद्ध ने बदली  तस्वीर

रूस-यूक्रेन युद्ध ने आधुनिक टैंक युद्ध को लेकर पूरी दुनिया की सोच बदल दी है। युद्ध में यूक्रेनी ड्रोन हमलों ने रूस के कई अत्याधुनिक टैंकों को नष्ट किया, जिसके बाद भारी बख्तरबंद वाहनों की सुरक्षा और उपयोगिता पर सवाल उठने लगे। छोटे FPV ड्रोन और ड्रोन स्वॉर्म तकनीक ने पारंपरिक टैंक युद्ध के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। यूक्रेन युद्ध में सैकड़ों रूसी टैंक ड्रोन हमलों का शिकार हुए, जिससे दुनिया भर की सेनाएं अब अपने टैंक सुरक्षा सिस्टम को आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रही हैं।

भारत के लिए चुनौती

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भविष्य के युद्ध में टैंकों को ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसे आधुनिक खतरों से कैसे सुरक्षित रखा जाए। आने वाले समय में केवल मजबूत कवच पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि टैंकों को एंटी-ड्रोन सिस्टम, एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम (APS), इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग और AI आधारित निगरानी तकनीकों से लैस करना होगा।

अर्जुन टैंक नहीं बन पाया मुख्य विकल्प

भारत ने अपना स्वदेशी ‘अर्जुन मुख्य युद्धक टैंक’ (Arjun MBT) भी विकसित किया था। हालांकि तकनीकी देरी, भारी वजन और ज्यादा मेंटेनेंस की जरूरत के कारण सेना ने इसे बड़े पैमाने पर अपनाने से परहेज किया। अर्जुन टैंक तकनीकी रूप से मजबूत माना जाता है, लेकिन भारतीय सेना की परिचालन जरूरतों और तेजी से तैनाती की रणनीति के हिसाब से T-90 अधिक व्यावहारिक साबित हुआ।

आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की कदम

1000वां T-90 टैंक तैयार होना भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत अब केवल हथियार आयात करने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि आधुनिक सैन्य प्लेटफॉर्म के निर्माण और तकनीकी विकास में भी बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है।  भविष्य में भारत स्वदेशी टैंक तकनीक, AI आधारित युद्ध प्रणाली और आधुनिक एंटी-ड्रोन सुरक्षा तकनीकों पर और तेजी से काम करेगा।
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