Cane Toad Australia: ऑस्ट्रेलिया के पिलबारा क्षेत्र में जहरीले केन टोड के बढ़ते खतरे को रोकने के लिए बड़ी संरक्षण योजना तैयार की गई है। खनन क्षेत्र की दिग्गज कंपनी रियो टिंटो इस आक्रामक प्रजाति को फैलने से रोकने के लिए करीब 185 करोड़ रूपए खर्च करेगी। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य पिलबारा के अनोखे पारिस्थितिकी तंत्र और वहां रहने वाले वन्यजीवों को सुरक्षित रखना है। इस परियोजना के लिए रियो टिंटो 28 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर खर्च करेगी। योजना को पर्थ स्थित कर्टिन विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों के सहयोग से आगे बढ़ाया जाएगा।
स्थानीय वन्यजीवों के लिए क्यों खतरनाक है केन टोड?
केन टोड भले ही खनन कंपनी के कारोबार के लिए सीधा खतरा नहीं हैं, लेकिन इनसे निकलने वाला जहरीला पदार्थ स्थानीय जीव-जंतुओं के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। पिलबारा में इनकी मौजूदगी बढ़ने से कई देशी प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया के न्यांगुमार्टा वॉरेन आदिवासी रिजर्व में रेंजर के तौर पर काम करने वाली रोबर्टा हंटर ने भी इस खतरे को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि केन टोड पानी के स्रोतों और स्थानीय जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं। आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक क्षेत्र को इस खतरे से बचाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाना चाहता है।
7,500 वर्ग किलोमीटर में बनेगा सुरक्षा घेरा
इस योजना के तहत ग्रेट सैंडी रेगिस्तान और हिंद महासागर के बीच लगभग 7,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में एक विशेष अवरोध तैयार किया जाएगा। इसका मकसद केन टोड को पानी के स्रोतों तक पहुंचने से रोकना है। दरअसल, सूखे मौसम में जीवित रहने के लिए इन टोड को हर कुछ दिनों में पानी की जरूरत होती है। प्राकृतिक जल स्रोत नहीं मिलने पर ये पशुपालन और सिंचाई के लिए बनाए गए कृत्रिम जल स्रोतों का सहारा लेते हैं। इसी वजह से परियोजना के तहत बांधों, पानी की टंकियों और दूसरे जल भंडारण स्थलों को सुरक्षित करने पर काम किया जाएगा। पांच साल तक चलने वाली इस परियोजना की शुरुआत 2027 में प्रस्तावित है।
पिलबारा की कई दुर्लभ प्रजातियों पर मंडरा रहा खतरा
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि केन टोड पिलबारा क्षेत्र में पहुंच गए, तो वहां की कई स्थानीय प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। इनमें लुप्तप्राय उत्तरी क्वोल, गोआना छिपकली और घोस्ट बैट जैसे जीव शामिल हैं। कर्टिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बेन फिलिप्स के मुताबिक, यदि समय रहते इनकी बढ़ती आबादी को नहीं रोका गया, तो अगले दो दशकों में केन टोड पिलबारा तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने इस संरक्षण योजना को क्षेत्र की अनूठी जैव विविधता बचाने का महत्वपूर्ण अवसर बताया है।1935 में ऑस्ट्रेलिया लाए गए थे केन टोड केन टोड
मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया के नहीं हैं। वर्ष 1935 में गन्ने की फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों पर नियंत्रण पाने के उद्देश्य से इन्हें ऑस्ट्रेलिया लाया गया था। हालांकि, समय के साथ इनकी संख्या बढ़ती गई और अब ये देश के उत्तरी हिस्सों से पश्चिम की ओर फैल रहे हैं। ऑस्ट्रेलियाई सरकार के आंकड़ों के अनुसार, केन टोड हर साल लगभग 40 से 60 किलोमीटर तक अपना दायरा बढ़ा रहे हैं। इनकी आबादी को नियंत्रित करने वाले प्राकृतिक शिकारी भी सीमित हैं। इनके शरीर से निकलने वाला जहर शिकारियों को दूर रखता है।











