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लिपुलेख : विवाद  फिर गरमाया, नेपाल में भारत को लेकर बढ़ी नाराजगी

भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख सीमा विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। नेपाल में बलेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को लेकर भारत के खिलाफ नाराजगी बढ़ी है। नेपाल का दावा है कि ये इलाके उसके हैं, जबकि भारत इन्हें अपना हिस्सा मानता है। यह विवाद 1815 की सुगौली संधि और काली नदी के वास्तविक उद्गम स्थल को लेकर जुड़ा हुआ है। लिपुलेख दर्रा कैलाश मानसरोवर यात्रा, भारत-चीन व्यापार और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। नेपाल के विशेषज्ञ पुराने नक्शों और दस्तावेजों के आधार पर अपने दावे को सही बता रहे हैं, जबकि भारत का कहना है कि सीमा विवाद बातचीत से सुलझाए जा सकते हैं।

कीर्तिमान नेटवर्क
13 May 2026, 01:21 PM
नेपाल
नेपाल की राजनीति में आए बदलावों के बाद एक बार फिर भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख सीमा विवाद चर्चा के केंद्र में आ गया है। नेपाल में बलेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत से जुड़े कई पुराने मुद्दों पर बहस तेज हो गई है। खासकर लिपुलेख दर्रा, कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग और चीन के साथ व्यापार को लेकर नेपाल में राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में नाराजगी बढ़ती दिखाई दे रही है।
नेपाल सरकार ने हाल ही में भारत के सामने लिपुलेख क्षेत्र को लेकर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है। हालांकि भारत ने नेपाल के इस दावे को खारिज कर दिया। वहीं चाइना ने फिलहाल इस पूरे विवाद पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। नेपाल में कई विशेषज्ञ, पूर्व अधिकारी और राजनीतिक दल इस मुद्दे को देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान से जोड़कर देख रहे हैं।

क्या है लिपुलेख विवाद

लिपुलेख दर्रा भारत, नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र के बीच स्थित एक रणनीतिक पहाड़ी दर्रा है। यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ इलाके के पास स्थित है और लंबे समय से भारत के नियंत्रण में है। यह दर्रा धार्मिक, सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत सरकार इसी रास्ते से कैलाश मानसरोवर यात्रा संचालित करती है। इसके अलावा भारत और चीन के बीच सीमित व्यापार के लिए भी यह मार्ग उपयोग में आता है। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र उसके भूभाग का हिस्सा हैं। वहीं भारत का कहना है कि यह इलाका ऐतिहासिक रूप से भारतीय प्रशासन के अधीन रहा है और लंबे समय से भारत इसकी देखरेख करता आया है।

कैसे शुरू हुआ यह विवाद

इस विवाद की जड़ें 1815 की सुगौली संधि से जुड़ी हुई हैं। यह समझौता ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुआ था। इस संधि के अनुसार काली नदी को भारत और नेपाल की पश्चिमी सीमा माना गया था। लेकिन असली विवाद इस बात को लेकर है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्थल कौन सा है। नेपाल का दावा है कि काली नदी की शुरुआत लिम्पियाधुरा से होती है। यदि इस दावे को सही माना जाए, तो कालापानी और लिपुलेख का पूरा क्षेत्र नेपाल के हिस्से में आता है। वहीं भारत का कहना है कि काली नदी का वास्तविक स्रोत कालापानी के पास है। इसी आधार पर भारत इस क्षेत्र को अपना हिस्सा मानता है।

नेपाल के विशेषज्ञों का दावा

नेपाल के पूर्व कूटनीतिक अधिकारी गोपाल बहादुर थापा  ने हाल ही में नेपाली “काठमांडू पोस्ट” में लिखे एक लेख में दावा किया कि पुराने नक्शे और ऐतिहासिक दस्तावेज नेपाल के पक्ष में हैं।
उन्होंने कहा कि ब्रिटिश और नेपाली रिकॉर्ड में पहले काली नदी को लिम्पियाधुरा से निकलता हुआ दिखाया गया था, लेकिन बाद में ब्रिटिश सर्वेयरों ने नक्शों में बदलाव कर दिए। थापा के अनुसार 1850 के दशक के बाद कई नक्शों में “काली नदी” का नाम बदलकर “कुटी” और “कुटियांगती” जैसे नाम लिखे जाने लगे। उनका आरोप है कि अंग्रेजों ने रणनीतिक कारणों से सीमाओं को बदलने की कोशिश की थी।

2020 में क्यों बढ़ा था तनाव

लिपुलेख विवाद 2020 में सबसे ज्यादा चर्चा में आया था। उस समय भारत ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख तक सड़क निर्माण किया था। नेपाल ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा कि भारत उसके क्षेत्र में सड़क बना रहा है। इसके बाद नेपाल सरकार ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया।
 भारत ने नेपाल के इस नक्शे को “कृत्रिम विस्तार” बताते हुए खारिज कर दिया था। इसके बाद दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव बढ़ गया था।

चीन की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है

लिपुलेख क्षेत्र सीधे चीन के तिब्बत इलाके से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह विवाद सिर्फ भारत और नेपाल तक सीमित नहीं माना जाता। भारत और चीन के बीच 2015 में लिपुलेख के जरिए व्यापार और यात्रा को लेकर समझौता हुआ था। नेपाल ने उस समय भी विरोध जताते हुए कहा था कि उसकी सहमति के बिना विवादित क्षेत्र पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। हालांकि इस बार चीन ने विवाद पर कोई खुली टिप्पणी नहीं की है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है।

नेपाल में भारत विरोधी माहौल क्यों बनता है

नेपाल में समय-समय पर भारत विरोधी भावनाएं उभरती रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीमा विवाद जैसे मुद्दों को नेपाल में राष्ट्रवाद से जोड़कर देखा जाता है। नेपाल के कई राजनीतिक दल भारत के खिलाफ सख्त रुख दिखाकर जनता के बीच अपनी लोकप्रियता बढ़ाने की कोशिश करते हैं। अब बलेन शाह के नेतृत्व में भी सीमा और संप्रभुता जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।
 विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल की घरेलू राजनीति में भारत से जुड़े मुद्दे हमेशा संवेदनशील रहे हैं और चुनावी राजनीति में भी इनका इस्तेमाल होता रहा है।

भारत का रुख क्या है

भारत लगातार यह कहता रहा है कि नेपाल के साथ सभी सीमा विवाद बातचीत और कूटनीतिक माध्यमों से सुलझाए जा सकते हैं। नई दिल्ली का कहना है कि भारत और नेपाल के रिश्ते ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से बेहद मजबूत हैं। भारत यह भी मानता है कि लिपुलेख क्षेत्र उसकी सुरक्षा और सीमा प्रबंधन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भारत इस इलाके को रणनीतिक दृष्टि से संवेदनशील मानता है।

 क्यों महत्वपूर्ण है लिपुलेख

लिपुलेख सिर्फ सीमा विवाद का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह धार्मिक, व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से बेहद अहम क्षेत्र माना जाता है।
लिपुलेख की अहमियत
  1.  कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रमुख मार्ग
  2.  भारत-चीन व्यापार के लिए महत्वपूर्ण रास्ता
  3.  हिमालयी सुरक्षा के लिहाज से रणनीतिक इलाका
  4. भारत, नेपाल और चीन के बीच अहम भू-राजनीतिक क्षेत्र
  5.  सीमा सुरक्षा और सैन्य निगरानी के लिए महत्वपूर्ण स्थान

दक्षिण एशिया की राजनीति से जुड़ा बड़ा मुद्दा

विशेषज्ञों का मानना है कि लिपुलेख विवाद सिर्फ नक्शों या सीमाओं का विवाद नहीं है। यह दक्षिण एशिया की राजनीति, चीन-भारत संबंधों और नेपाल की आंतरिक राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि यह मुद्दा समय-समय पर फिर उभर जाता है और तीनों देशों के बीच कूटनीतिक हलचल बढ़ा देता है। आने वाले समय में भारत और नेपाल इस मुद्दे को बातचीत के जरिए कैसे सुलझाते हैं, इस पर पूरे क्षेत्र की नजर बनी हुई है।

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