अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच अब संभावित समझौते को लेकर बड़ी कूटनीतिक हलचल देखने को मिल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी बातचीत को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि अमेरिका किसी भी समझौते को लेकर जल्दबाजी नहीं करेगा और जब तक अंतिम समझौता नहीं हो जाता, तब तक ईरानी बंदरगाहों पर नाकाबंदी जारी रहेगी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत “सही दिशा” में आगे बढ़ रही है, लेकिन किसी भी प्रकार की जल्दबाजी खतरनाक साबित हो सकती है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को पर्याप्त समय लेकर हर पहलू पर सावधानी से काम करना चाहिए ताकि भविष्य में कोई गंभीर गलती न हो।
ट्रंप बोले- समय अमेरिका के पक्ष में
ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने अमेरिकी प्रतिनिधियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी डील को जल्दी अंतिम रूप देने का दबाव न बनाया जाए। उन्होंने लिखा, “समय हमारे पक्ष में है। जब तक कोई समझौता पूरी तरह प्रमाणित नहीं हो जाता और उस पर हस्ताक्षर नहीं हो जाते, तब तक नाकाबंदी जारी रहेगी।” ट्रंप का यह बयान ईरान पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु कार्यक्रम को लेकर स्पष्ट और ठोस प्रतिबद्धता दे, जबकि तेहरान अपने ऊपर लगे प्रतिबंधों में राहत चाहता है।
ओबामा युग पर हमला
ट्रंप ने इस दौरान पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए ईरान परमाणु समझौते को भी निशाने पर लिया। उन्होंने उस समझौते को “कमजोर” और “नौसिखियों की डील” बताते हुए कहा कि उसी समझौते ने ईरान को परमाणु हथियार क्षमता बढ़ाने का मौका दिया। ट्रंप ने कहा कि वर्तमान अमेरिकी प्रशासन ईरान के साथ कहीं अधिक “पेशेवर और प्रभावी” तरीके से बातचीत कर रहा है। हालांकि उन्होंने दोहराया कि अमेरिका किसी भी स्थिति में ईरान को परमाणु हथियार बनाने या हासिल करने की अनुमति नहीं देगा।
परमाणु मुद्दे पर फंसी बातचीत
अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता अभी कई विवादित मुद्दों पर अटकी हुई है। सबसे बड़ा मुद्दा ईरान का परमाणु कार्यक्रम और अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम का भंडार है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ईरान ने सिद्धांत रूप से अपने हाई-ग्रेड यूरेनियम स्टॉक को कम करने पर सहमति जताई है, हालांकि इसके तकनीकी और निरीक्षण संबंधी पहलुओं पर अभी बातचीत जारी है। व्हाइट हाउस का मानना है कि ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने समझौते के व्यापक ढांचे को समर्थन दिया है, लेकिन तेहरान की ओर से अब तक इसकी औपचारिक पुष्टि नहीं की गई है। दूसरी ओर, ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने कहा है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं कर रहा और उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर सहमति
प्रस्तावित समझौते का सबसे संवेदनशील हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ा हुआ है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। प्रस्तावित समझौते में 60 दिनों का युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना और समुद्री प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील देने जैसे बिंदु शामिल हैं। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ईरान ने सिद्धांत रूप से जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर सहमति व्यक्त की है, बशर्ते अमेरिका नौसैनिक नाकाबंदी में राहत दे। अगर यह समझौता सफल होता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार और पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर पड़ सकता है।
वैश्विक बाजारों की नजर वार्ता
अमेरिका-ईरान वार्ता पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है। तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय निवेशक और पश्चिम एशियाई देश इस बातचीत के नतीजों पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच समझौता हो जाता है तो इससे वैश्विक ऊर्जा संकट में राहत मिल सकती है और कच्चे तेल की कीमतों में भी स्थिरता आ सकती है। हालांकि कई रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि अंतिम समझौते तक पहुंचना अभी भी आसान नहीं होगा।
पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव, समुद्री टकराव और परमाणु विवाद लगातार बढ़ते रहे हैं। कई बार हालात युद्ध जैसी स्थिति तक पहुंच गए थे। ऐसे में वर्तमान वार्ता को पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। ट्रंप के ताजा बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका फिलहाल दबाव की रणनीति छोड़ने के मूड में नहीं है और वह किसी भी समझौते को पूरी तरह अपने सुरक्षा हितों के अनुरूप ही अंतिम रूप देना चाहता है।
