मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित स्टेट म्यूजियम में एक बड़ा ऐतिहासिक खुलासा हुआ है। यहाँ पिछले 900 वर्षों से जिस मूर्ति को देवी सरस्वती का रूप माना जा रहा था, वह वास्तव में देवी गायत्री की है। यह मूर्ति 12वीं सदी की है और लाल बलुआ पत्थर से तराशी गई है। आधुनिक तकनीक के माध्यम से हुई जांच ने सदियों पुराने इस भ्रम को पूरी तरह दूर कर दिया है। म्यूजियम में रखी यह मूर्ति मूल रूप से धार जिले से मिली थी।
धार कभी परमार राजवंश की राजधानी हुआ करता था। राज्य पुरातत्व निदेशालय ने जब मूर्ति की विस्तृत जांच की, तो तथ्यों में बड़ा बदलाव सामने आया। पुरातत्वविदों ने हाई-रिजॉल्यूशन मैपिंग और शास्त्रों के गहन अध्ययन के बाद इसकी सही पहचान की है। भोपाल स्टेट म्यूजियम की यह मूर्ति अब इतिहास के एक नए अध्याय को खोल रही है।
कैसे टूटी सदियों पुरानी गलतफहमी
पुरातत्वविद रमेश यादव के अनुसार, इस मूर्ति की बनावट प्राचीन शास्त्रों से मेल खाती है। मूर्ति में चार भुजाएं हैं और देवी ललितासन मुद्रा में विराजमान हैं। उनके हाथों में माला, कमल और वेद मौजूद हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस मूर्ति में वीणा का कहीं कोई अंकन नहीं है। जबकि गुप्त काल के बाद से देवी सरस्वती को हमेशा वीणा के साथ दर्शाने की परंपरा रही है।
गायत्री और सरस्वती की मूर्ति में अंतर
इतिहासकार बी.के. लोखंडे ने बताया कि श्रीमद देवी भागवत पुराण और शिल्पशास्त्र के नियमों के आधार पर यह मूर्ति गायत्री माता की है। इसके मुख्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:
सरस्वती की मूर्ति में वीणा का होना अनिवार्य है, जो यहाँ नहीं है।
इस मूर्ति की भुजाओं में साक्षात वेद मौजूद हैं, जो देवी गायत्री को वेदमाता सिद्ध करते हैं।
मूर्ति में अक्षमाला और कमल का फूल है, जो गायत्री के स्वरूप का वर्णन करता है।
मूर्ति के पास मौजूद हंस आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता का प्रतीक है।
दुर्लभ है परमार कालीन यह कलाकृति
भारत में मां गायत्री की इतनी प्राचीन मूर्तियां मिलना बेहद दुर्लभ है। यह मूर्ति परमार राजाओं के शासनकाल की उत्कृष्ट कला का नमूना है। इसमें पश्चिमी चालुक्य शैली का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। सनातन परंपरा में देवी गायत्री को वेदमाता और मंत्रमाता के रूप में सर्वोच्च स्थान दिया गया है। भोपाल स्टेट म्यूजियम की यह खोज अब कला प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है।