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चंदरी झील में अवैध खनन का खेल
चंदरी झील में अवैध खनन का खेल
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चंदेरी झील विवाद : जल गंगा संवर्धन या माफिया का संवर्धन? CS की फटकार भी बेअसर

मध्य प्रदेश के अशोकनगर स्थित चंदेरी झील में ‘जल गंगा संवर्धन अभियान’ के नाम पर बड़े पैमाने पर अवैध खनन का आरोप सामने आया है। ग्रामीणों का दावा है कि झील से गहरीकरण की आड़ में कीमती कोपरा निकालकर रोजाना 50–60 ओवरलोड ट्रकों से अवैध रूप से बेचा जा रहा है। इससे सरकार को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है।

कीर्तिमान न्यूज
01 Jun 2026, 10:14 AM
भोपाल

मध्य प्रदेश में एक तरफ मोहन यादव सरकार सूबे से अवैध उत्खनन को पूरी तरह जड़ से खत्म करने का दावा कर रही है, तो वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत दावों को मुंह चिढ़ा रही है। ताजा मामला अचारपुरा-डोबरा रोड स्थित कुठार की चंदेरी झील का है, जहां खनन माफिया प्रशासन की नाक के नीचे दिन-रात अवैध खनन के खेल को अंजाम दे रहे हैं।

हैरानी की बात यह है कि मुख्य सचिव (CS) अनुराग जैन खुद इस मुद्दे पर कलेक्टर और कमिश्नरों को सख्त लहजे में फटकार लगा चुके हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि साहबों की घुड़की का असर वातानुकूलित कमरों से बाहर नहीं निकल पाया है। माफिया बेखौफ होकर भारी-भरकम पोकलेन मशीनें उतारकर झील का सीना छलनी कर रहे हैं।

'जल गंगा संवर्धन अभियान' बना ढाल

इस पूरे अवैध काले कारोबार का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसका 'कवर अप' (आवरण) है। सरकार ने जलस्रोतों को बचाने के लिए 'जल गंगा संवर्धन अभियान' शुरू किया था ताकि तालाबों और झीलों का गहरीकरण हो सके। लेकिन चंदेरी झील में स्थानीय सरपंच और सचिव इसी अभियान को अपनी ढाल बना रहे हैं।

  • कागजी सच: स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों का दावा है कि यहां सरकारी योजना के तहत सिर्फ गहरीकरण (Desilting) किया जा रहा है।

  • जमीनी सच: गहरीकरण की आड़ में माफियाओं ने पैर पसार लिए हैं। झील से मिट्टी नहीं, बल्कि कीमती 'कोपरा' निकाला जा रहा है।

ग्रामीणों का बड़ा आरोप: "गहरीकरण तो सिर्फ एक बहाना है, असली मकसद कोपरा चोरी है। हर दिन चंदेरी झील से करीब 50 से 60 ओवरलोड ट्रक कोपरा निकाला जा रहा है, जिसे आसपास के शहरों और कंस्ट्रक्शन साइट्स पर महंगे दामों में खुलेआम बेचा जा रहा है। इस खेल से सरकार को हर दिन लाखों रुपये के राजस्व का चूना लग रहा है।"

माइनिंग विभाग की 'मौन स्वीकृति' या लाचारी?

ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि माइनिंग विभाग (खनिज विभाग) और स्थानीय प्रशासन की 'मौन स्वीकृति' के बिना इतना बड़ा खेल मुमकिन ही नहीं है। जिस रोड से दिन-रात 60-60 डंपर गुजर रहे हों, वह खनिज विभाग के अमले को दिखाई न दे, यह गले नहीं उतरता। ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत करने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी आंखें मूंदे बैठे हैं, जिससे माफियाओं के हौसले आसमान पर हैं।

प्रशासनिक रुख: 'जानकारी नहीं है, जांच कराएंगे'

जब इस पूरे मामले को लेकर जिला खनिज अधिकारी एमएस रावत से तीखे सवाल किए गए, तो उनका जवाब वही ढाक के तीन पात वाला रहा।

खनिज अधिकारी का बयान: "चंदेरी झील में जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत गहरीकरण का काम स्वीकृत है। वहां व्यावसायिक तौर पर अवैध खनन कर कोपरा बेचे जाने की कोई आधिकारिक जानकारी फिलहाल हमारे पास नहीं है। अगर ऐसा हो रहा है, तो हम जल्द ही राजस्व और पुलिस के साथ एक संयुक्त टीम (Joint Team) बनाकर मौके पर भेजेंगे। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।"

कब तक 'जांच' के भरोसे बचेगा पर्यावरण?

अधिकारियों का यह 'रटा-रटाया' जवाब अब जनता के गले नहीं उतर रहा है। सवाल यह है कि जब सूबे के सबसे बड़े प्रशासनिक अधिकारी (CS) खुद इस पर नजर बनाए हुए हैं, तब भी जिला स्तर के अधिकारी किसी बड़ी कार्रवाई के लिए 'शिकायत या जानकारी' का इंतजार क्यों कर रहे हैं? क्या चंदेरी झील पूरी तरह तबाही के मुहाने पर पहुंच जाएगी, तब प्रशासन की नींद टूटेगी? अब देखना दिलचस्प होगा कि इस खुलासे के बाद जिम्मेदार अमला माफियाओं पर बुल्डोजर चलाता है या फिर यह फाइल भी 'जांच' के नाम पर दबा दी जाती है।

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