किसी भी परिवार के मुखिया का साया सिर से उठ जाना एक बड़ा आघात होता है, लेकिन मुसीबत तब और बढ़ जाती है जब सालों बाद भी जमीन-जायदाद के सरकारी दस्तावेजों में उनका ही नाम चलता रहे। बस्तर के आदिवासी अंचलों में यह एक ऐसी समस्या थी, जिससे हजारों ग्रामीण जूझ रहे थे। मामूली से काम के लिए भी लोगों को दफ्तरों की खाक छाननी पड़ती थी। इस कड़वे सच को बदलते हुए बस्तर जिला प्रशासन ने खुद आगे बढ़कर एक ऐसी मुहिम शुरू की, जिसने ग्रामीणों की बरसों पुरानी चिंता को एक झटके में दूर कर दिया है।
611 गांवों का सर्वे
प्रशासन की टीमों ने बस्तर जिले के 611 गांवों में सघन सर्वे किया। ग्राम सचिवों के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले चार वर्षों में कुल 17,405 लोगों की मृत्यु दर्ज हुई थी। जब इन आंकड़ों को जमीन के रिकॉर्ड से मिलाया गया, तो चौंकाने वाली बात सामने आई कि 8,651 मामलों में फौती नामांतरण की सख्त जरूरत थी, जो सालों से पेंडिंग पड़े थे। इस अभियान की सबसे बड़ी खूबसूरती यह रही कि ग्रामीणों को सरकारी दफ्तरों की चौखट पर एड़ियां नहीं रगड़नी पड़ीं।
तहसीलवार आंकड़े
जिले की विभिन्न तहसीलों में मिले आंकड़ों के अनुसार काम की रफ्तार बेहद संतुलित रही:
तोकापाल: 1,454 मामले सुलझाए गए
बकावंड: 1,142 परिवारों को मिला हक
जगदलपुर: 1,057 रिकॉर्ड अपडेट हुए
बस्तर: 1,019 मामलों का निपटारा
भानपुरी: 959 मामले हल किए गए
लोहंडीगुड़ा: 799 परिवारों को राहत
नानगुर: 518 मामले क्लियर हुए
करपावंड: 504 रिकॉर्ड दुरुस्त हुए
दरभा: 452 मामले निपटाए गए
बास्तानार: 337 परिवारों का हुआ नामांतरण
8,241 परिवारों की जमीन के रिकॉर्ड दुरुस्त
इस भागीरथी प्रयास के परिणाम उम्मीद से कहीं ज्यादा बेहतर रहे हैं। अब तक कुल 8,651 मामलों में से 8,241 का फौती नामांतरण सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है। यानी हजारों परिवारों की जमीन अब उनके नाम पर आ चुकी है। अब सिर्फ 410 मामले ऐसे बचे हैं जिन पर तेजी से काम चल रहा है और जल्द ही इन्हें भी निपटा लिया जाएगा।
जगदलपुर और लोहंडीगुड़ा ने रच दिया इतिहास
क्षेत्रवार प्रगति की बात करें तो बकावंड, करपावंड, नानगुर और बास्तानार जैसे इलाकों में टीम ने कमाल का काम किया है। वहीं जगदलपुर और लोहंडीगुड़ा जैसी तहसीलों ने तो मिसाल कायम करते हुए अपने यहाँ के लगभग शत-प्रतिशत पात्र मामलों का निपटारा कर दिया है। सूबे के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि सरकार का असल काम केवल नीतियां बनाना नहीं, बल्कि यह देखना है कि उसका लाभ समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचे।