महासंघ की ये हैं 9 प्रमुख मांगें:
- किराया वृद्धि: यात्री किराए में जल्द से जल्द बढ़ोतरी की जाए।
- सिंगल स्लीपर पर टैक्स छूट: बसों में मौजूद सिंगल स्लीपर सीटों के लिए सिर्फ 'सिंगल टैक्स' ही लिया जाए।
- ई-बसों का दायरा तय हो: नई शुरू की जा रही ई-बसों (E-Buses) का संचालन केवल शहर की सीमाओं तक ही सीमित रखा जाए, ताकि ग्रामीण और लंबे रूट के ऑपरेटरों का नुकसान न हो।
- ऑल इंडिया परमिट बसों पर लगाम: ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट वाली बसों को ग्रामीण इलाकों और स्थानीय बस स्टैंडों से सवारियां उठाने पर सख्त रोक लगाई जाए।
बसों के समयचक्र (Time Table) में सुधार: स्टेज कैरिज बसों की टाइमिंग इस तरह तय हो कि दो बसों के बीच पर्याप्त और सही समय अंतराल (Gap) रहे, जिससे खींचतान की नौबत न आए।
- VLTD रिन्यूअल फीस कम हो: गाड़ियों में लगे 'व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस' (VLTD) के रिन्यूअल की ऊंची दरों में कटौती की जाए।
- VLTD रिन्यूअल फीस कम हो: गाड़ियों में लगे 'व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस' (VLTD) के रिन्यूअल की ऊंची दरों में कटौती की जाए।
- मैनुअल फिटनेस सुविधा: गाड़ियों की फिटनेस जांच में आ रही व्यावहारिक दिक्कतों को देखते हुए मैनुअल फिटनेस देने की प्रक्रिया फिर बहाल की जाए।
- प्रतिहस्ताक्षर (Countersignature) पर नियंत्रण: परमिट काउंटर-सिग्नेचर की व्यवस्था को सुव्यवस्थित और नियंत्रित किया जाए।
- ऑनलाइन परमिट की सुविधा: सभी श्रेणियों की बसों के लिए परमिट बनाने की पूरी प्रक्रिया को ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया जाए।
यात्रियों की बढ़ सकती हैं मुश्किलें
यदि 21 सितंबर तक सरकार और यातायात महासंघ के बीच बात नहीं बनती है, तो 22 सितंबर से आम लोगों को भारी फजीहत का सामना करना पड़ सकता है। त्योहारों और छुट्टियों के इस मौसम में बसों के पहिए थमने से रोजाना सफर करने वाले लाखों यात्रियों, नौकरीपेशा लोगों और छात्रों की परेशानियां बढ़ना तय माना जा रहा है। अब सभी की निगाहें शासन के अगले रुख पर टिकी हैं।

