China Backs Iran: ईरान के खिलाफ अमेरिका ने प्रतिबंधों का दायरा बढ़ाते हुए बड़े वित्तीय अभियान की घोषणा की है। वॉशिंगटन का दावा है कि इन कदमों से तेहरान की आय के स्रोतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों पर कड़ा प्रहार होगा। हालांकि, चीन और रूस जैसे देशों के रुख के कारण अमेरिकी प्रतिबंधों की प्रभावशीलता पर सवाल भी उठ रहे हैं। ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह नए प्रतिबंधों का मुकाबला करने के लिए तैयार है। ईरान के अर्थव्यवस्था मंत्री अली मदनिजादेह के मुताबिक, सरकार ने संभावित आर्थिक दबाव से निपटने के लिए दो वर्ष की योजना तैयार कर रखी है।
अमेरिका ने दी व्यापारिक साझेदारों को चेतावनी
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने नए प्रतिबंधों को ईरान के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा वित्तीय हमला बताया है। अमेरिका ने चेतावनी दी है कि ईरान के साथ आर्थिक साझेदारी जारी रखने वाले देशों, बैंकों और कंपनियों को भी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से अलग करने की कार्रवाई हो सकती है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि ईरान प्रतिबंधों से बचने के लिए जिन माध्यमों का इस्तेमाल करता रहा है, उनकी पहचान कर ली गई है। इसी के तहत डिजिटल संपत्ति, तकनीक, सोना, विमानन और जहाजरानी से जुड़े नेटवर्क को निशाना बनाया जा रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने लगभग 60 संस्थाओं, व्यक्तियों और जहाजों के खिलाफ प्रतिबंध लगाने की बात भी कही है। बेसेंट के अनुसार, ईरान के सामने अब दो रास्ते हैं—या तो वह वैश्विक स्तर पर आर्थिक अलगाव का सामना करे अथवा सामान्य स्थिति की ओर लौटते हुए अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से दोबारा जुड़ने का प्रयास करे।
ईरान ने कहा—प्रतिबंधों के लिए पूरी तरह तैयार
अमेरिकी घोषणा के बाद ईरान ने भरोसा जताया कि वह दूसरे देशों के साथ अपना व्यापार जारी रखने में सक्षम है। मदनिजादेह ने सरकारी टेलीविजन से बातचीत में कहा कि सरकार लंबे समय से ऐसी परिस्थितियों की तैयारी कर रही थी और उसके पास प्रतिबंधों से निपटने के अपने तरीके मौजूद हैं। ईरान का मानना है कि अमेरिका को इस अभियान में अपेक्षित सफलता नहीं मिलेगी। हालांकि, संयुक्त अरब अमीरात द्वारा ईरान के साथ वित्तीय लेनदेन रोकने की घोषणा ने तेहरान के सामने नई चुनौती जरूर खड़ी कर दी है।अमेरिकी प्रतिबंधों पर चीन का कड़ा विरोध
ईरान के लिए सबसे महत्वपूर्ण पहलू चीन का समर्थन है। चीन ने अमेरिकी प्रतिबंधों को अवैध और एकतरफा बताते हुए इनका विरोध किया है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियांग ने कहा कि आर्थिक दबाव डालकर किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बीजिंग अपने वैध हितों की रक्षा करेगा। चीन लंबे समय से ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ईरान के तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा चीन पहुंचता है। बीजिंग पूर्व में भी अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों को मान्यता देने से इनकार करता रहा है। ऐसे में इस बार भी उसके पीछे हटने की संभावना कम मानी जा रही है।
क्या कमजोर पड़ जाएगा अमेरिकी दबाव ?
अमेरिकी प्रतिबंधों की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान के व्यापारिक साझेदार इनका कितना पालन करते हैं। यदि चीन ईरान से तेल खरीदना और वित्तीय संबंध बनाए रखना जारी रखता है, तो तेहरान की अर्थव्यवस्था पर प्रतिबंधों का प्रभाव सीमित रह सकता है। कैपिटल इकोनॉमिक्स के मुख्य जलवायु एवं कमोडिटी अर्थशास्त्री डेविड ऑक्सले ने भी नए प्रतिबंधों की प्रभावशीलता पर संदेह जताया है। उनके अनुसार, सैन्य और समुद्री गतिविधियों के कारण ईरानी तेल निर्यात पहले से प्रभावित है।पड़ोसी देशों के लिए संबंध तोड़ना आसान नहीं
ईरान के पड़ोसी देशों की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान, तुर्की और इराक जैसे देश अमेरिका के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन भौगोलिक, आर्थिक और सुरक्षा कारणों से ईरान के साथ अपने संबंध पूरी तरह समाप्त करना उनके लिए आसान नहीं होगा। इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप से जुड़े विशेषज्ञ अली वाएज के मुताबिक, ईरान पर आर्थिक दबाव पहले भी अपेक्षित राजनीतिक परिणाम देने में सफल नहीं रहा है। उनका मानना है कि ईरानी शासन लंबे समय तक आर्थिक कठिनाइयों को सहने और उसका बोझ घरेलू स्तर पर संभालने की रणनीति अपनाता रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ी चिंता
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। ईरान ने चेतावनी दी है कि युद्ध जारी रहने की स्थिति में क्षेत्र से होने वाला तेल निर्यात रोका जा सकता है। रिपोर्टों के अनुसार, जहाजों को बिना अनुमति होर्मुज जलडमरूमध्य से नहीं गुजरने की चेतावनी भी दी गई है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यहां किसी तरह की बाधा आने पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत तेजी से बढ़ सकती है। इसका सीधा असर पेट्रोल, डीजल, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ने की आशंका है।