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अमेरिकी वायु सेना का टारगेट ड्रोन
अमेरिकी वायु सेना का टारगेट ड्रोन
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अमेरिकी वायु सेना की बड़ी तैयारी, स्टील्थ फाइटर की नकल करेंगे नए टारगेट ड्रोन

अमेरिकी वायु सेना नई पीढ़ी के ऐसे टारगेट ड्रोन हासिल करने की तैयारी कर रही है, जो स्टील्थ फाइटर, भारी बमवर्षक, AWACS और छोटे-बड़े UAV की उड़ान व तकनीकी विशेषताओं की नकल कर सकें। इन ड्रोन का इस्तेमाल मिसाइल, एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य हथियारों की वास्तविक परिस्थितियों जैसी टेस्टिंग में किया जाएगा।

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प्रकाशित: 19 Aug 2026, 04:15 PM · अपडेट: 02 Oct 2026, 01:28 AM
अमेरिकी
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
अमेरिकी वायु सेना भविष्य के हवाई खतरों से निपटने के लिए अपने प्रशिक्षण और हथियार परीक्षण की व्यवस्था को और आधुनिक बनाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत ऐसे नई पीढ़ी के टारगेट ड्रोन हासिल करने की योजना है, जो स्टील्थ फाइटर, रणनीतिक बमवर्षक, बड़े सैन्य विमान और अलग-अलग श्रेणी के मानवरहित हवाई वाहनों की उड़ान और तकनीकी विशेषताओं की नकल कर सकें। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से वायु रक्षा प्रणालियों, मिसाइलों और अन्य हथियारों की क्षमता जांचने में किया जाएगा।

कम लागत में बड़ी संख्या में इस्तेमाल पर जोर 

अमेरिकी वायु सेना की योजना केवल अत्याधुनिक टारगेट ड्रोन विकसित करने तक सीमित नहीं है। वह ऐसे प्लेटफॉर्म चाहती है, जिनकी लागत अपेक्षाकृत कम हो और जिनका निर्माण भी आसान हो। जरूरत पड़ने पर इन्हें मिशन के दौरान खोने या नष्ट होने की स्थिति में भी बड़ी आर्थिक क्षति न हो। इसी वजह से पेंटागन निजी कंपनियों और व्यावसायिक तकनीकों की ओर भी देख रहा है। इसमें पहले से उपलब्ध कमर्शियल तकनीक, उनमें बदलाव कर तैयार किए गए सिस्टम और सैन्य व नागरिक दोनों क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाली दोहरे उपयोग की तकनीकों को शामिल किया जा सकता है। 

स्टील्थ फाइटर जैसी खूबियों की नकल 

लड़ाकू विमानों की भूमिका निभाने वाले टारगेट ड्रोन के लिए काफी चुनौतीपूर्ण क्षमताओं की मांग की गई है। इन्हें लगभग 40 हजार फीट की ऊंचाई पर मैक 1.6 या उससे अधिक की रफ्तार तक पहुंचने में सक्षम बनाने की जरूरत बताई गई है। इसके साथ ही तेज युद्धाभ्यास और उच्च-G मैनूवर जैसी क्षमताएं भी अपेक्षित हैं। सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में दुश्मन के आधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान जैसी रडार पहचान तैयार करना शामिल है। ड्रोन में कम रडार क्रॉस-सेक्शन प्रोफाइल, अलग-अलग इन्फ्रारेड सिग्नेचर, सक्रिय रेडियो फ्रीक्वेंसी उत्सर्जन और इलेक्ट्रॉनिक अटैक से जुड़ी क्षमताओं को शामिल करने पर भी विचार किया जा रहा है। 

C-130 जैसे बड़े विमानों के लिए अलग टारगेट 

योजना में केवल तेज रफ्तार लड़ाकू विमानों की नकल करने वाले ड्रोन शामिल नहीं हैं। C-130 जैसे बड़े मल्टी-इंजन विमानों की विशेषताओं को दर्शाने वाले टारगेट प्लेटफॉर्म की भी जरूरत है। ऐसे ड्रोन में बहुत ज्यादा गति के बजाय विमान के वास्तविक आकार, धीमी सबसोनिक उड़ान और प्रोपेलर या टर्बोफैन इंजन से मिलने वाले संकेतों को दोहराने पर जोर रहेगा। इनका रडार और इन्फ्रारेड सिग्नेचर भी वास्तविक बड़े विमान के करीब रखने की कोशिश होगी। इससे मिसाइल सीकर की सटीकता और बड़े लक्ष्यों के खिलाफ वारहेड के प्रभाव का परीक्षण किया जा सकेगा।

बमवर्षक और AWACS जैसे विमानों की भी होगी नकल 

रणनीतिक बमवर्षक और AWACS जैसे विशाल विमानों के लिए आवश्यकताएं और अलग होंगी। यहां मुख्य चुनौती बड़े विमान के आकार, उसके थर्मल सिग्नेचर और रडार पर दिखाई देने वाली विशेषताओं को वास्तविक रूप में पेश करने की होगी। इस तरह अमेरिकी वायु सेना बिना किसी वास्तविक महंगे सैन्य विमान को खतरे में डाले अपने हथियारों और वायु रक्षा प्रणालियों को बड़े रणनीतिक हवाई लक्ष्यों के खिलाफ जांच सकेगी।

छोटे ड्रोन से बड़े UAV तक की तैयारी 

नई योजना में अलग-अलग श्रेणी के UAV को भी शामिल किया गया है। बड़े ग्रुप-5 UAV की नकल करने वाले टारगेट ड्रोन को करीब 50 हजार फीट की ऊंचाई तक उड़ान भरने में सक्षम बनाने की आवश्यकता बताई गई है। ग्रुप-3 और ग्रुप-4 श्रेणी के UAV की भूमिका निभाने वाले टारगेट लगभग मैक 0.5 से 0.8 की रफ्तार से उड़ने और 3 से 6-G तक युद्धाभ्यास करने में सक्षम हो सकते हैं। वहीं छोटे ग्रुप-1 और ग्रुप-2 ड्रोन के मामले में 150 नॉट से कम गति के साथ ड्रोन स्वार्म जैसी परिस्थितियां तैयार करने पर जोर दिया गया है।

करीब एक सदी पुरानी है टारगेट ड्रोन की तकनीक 

रिमोट कंट्रोल वाले विमानों को सैन्य अभ्यास में लक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करने का विचार नया नहीं है। इसका इतिहास लगभग एक सदी पुराना है। 1930 के दशक में ब्रिटेन ने 'क्वीन बी' नाम के रिमोट-कंट्रोल विमान का इस्तेमाल किया था, जिसे टाइगर मॉथ ट्रेनर विमान में बदलाव कर तैयार किया गया था। समय के साथ टारगेट ड्रोन की तकनीक काफी बदल गई। आधुनिक युद्ध में स्टील्थ विमान, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और ड्रोन स्वार्म जैसी तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण अब प्रशिक्षण के लिए भी अधिक उन्नत और वास्तविक खतरों जैसी विशेषताओं वाले लक्ष्य की जरूरत महसूस की जा रही है।
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