इंदौर के बहुचर्चित शिवानी पटेरिया 'कोबरा मर्डर केस' में जिला अदालत ने करीब साढ़े छह साल बाद ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने बैंक अधिकारी अमितेष को पत्नी शिवानी पटेरिया की हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि आरोपी ने पहले पत्नी की हत्या की और फिर पूरे मामले को सांप के काटने से हुई मौत साबित करने के लिए सुनियोजित साजिश रची। इस मामले ने देशभर में उस समय सुर्खियां बटोरी थीं, क्योंकि हत्या को छिपाने के लिए जिस तरीके का इस्तेमाल किया गया, वह बेहद सनसनीखेज और दुर्लभ था। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने में सफल रहा है। कोर्ट ने माना कि अमितेष ने न केवल अपनी पत्नी की हत्या की, बल्कि अपराध छिपाने के लिए सबूत मिटाने की कोशिश भी की।
सबूत मिटाने और कोबरा मारने का दोषी
इसके अलावा उसने संरक्षित वन्यजीव कोबरा की भी हत्या की, जो वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत अपराध है। इस आधार पर अदालत ने विभिन्न धाराओं के तहत आरोपी को दोषी करार दिया। अभियोजन के अनुसार, अमितेष पेशे से बैंक अधिकारी था और उसने वारदात को अंजाम देने से पहले पूरी योजना बनाई थी। जांच में सामने आया कि उसने राजस्थान के अलवर से करीब 620 किलोमीटर दूर जाकर ब्लैक डेजर्ट प्रजाति का जहरीला कोबरा करीब 30 हजार रुपये में खरीदा था।
पहले से रची थी हत्या की साजिश
आरोपी कई दिनों तक सांप को अपने घर में छिपाकर रखता रहा, ताकि हत्या के बाद उसी का इस्तेमाल कर घटना को सर्पदंश का मामला बनाया जा सके।
अभियोजन के मुताबिक, 1 दिसंबर 2019 को इंदौर के संचार नगर स्थित अपने घर में अमितेष ने तकिए से पत्नी शिवानी पटेरिया का मुंह और गला दबाकर उसकी हत्या कर दी। हत्या के बाद उसने पहले से तैयार की गई साजिश के तहत कोबरा को मार डाला और उसके दांत शिवानी के हाथ पर गड़ा दिए। आरोपी चाहता था कि पुलिस और परिवार को लगे कि शिवानी की मौत जहरीले सांप के काटने से हुई है। शुरुआत में मामला सर्पदंश से मौत का माना जा रहा था, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए। डॉक्टरों ने पाया कि शरीर पर ऐसे निशान हैं जो दम घुटने की ओर इशारा कर रहे थे। इसके बाद फॉरेंसिक जांच कराई गई, जिसमें यह साफ हो गया कि महिला की मौत सांप के जहर से नहीं, बल्कि गला दबाने के कारण हुई थी।
वैज्ञानिक जांच में खुली साजिश
जांच के दौरान फॉरेंसिक विशेषज्ञों, डॉक्टरों और अन्य वैज्ञानिक साक्ष्यों ने आरोपी की पूरी कहानी को झूठा साबित कर दिया। पुलिस ने यह भी पता लगाया कि आरोपी ने जिस कोबरा का इस्तेमाल किया था, उसे पहले ही मार दिया गया था। इस तरह हत्या को प्राकृतिक सर्पदंश दिखाने की पूरी साजिश अदालत में बेनकाब हो गई। यह मामला पिछले साढ़े छह साल से अदालत में विचाराधीन था। इस दौरान अभियोजन पक्ष ने कई गवाहों के बयान, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, फॉरेंसिक रिपोर्ट और अन्य तकनीकी साक्ष्य अदालत के सामने पेश किए।साढ़े छह साल बाद मिला न्याय
सभी तथ्यों और सबूतों का परीक्षण करने के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि हत्या पूरी तरह सुनियोजित थी और आरोपी ने कानून को गुमराह करने की भी कोशिश की। अदालत द्वारा उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद इसे इंदौर के सबसे चर्चित हत्या मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला माना जा रहा है। लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद पीड़ित परिवार को न्याय मिला। यह फैसला इस बात का भी संदेश देता है कि अपराध को कितनी भी चालाकी से छिपाने की कोशिश क्यों न की जाए, वैज्ञानिक जांच और ठोस साक्ष्यों के आधार पर सच सामने आ ही जाता है।