उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। कांग्रेस आलाकमान ने यूपी में अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाने के लिए एक बड़ा दांव खेला है। पार्टी ने अविनाश पांडे की जगह दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री और दलित समाज के कद्दावर नेता राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का नया कांग्रेस प्रभारी नियुक्त किया है।
जिम्मेदारी संभालते ही राजेंद्र पाल के एक बयान ने सूबे के सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। कार्यभार संभालने के बाद मीडिया से मुखातिब होते हुए राजेंद्र पाल गौतम ने सीधे तौर पर बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रमुख मायावती का जिक्र किया और उनकी जमकर तारीफ की। उन्होंने साफ कहा कि अगर देश और संविधान की रक्षा करनी है और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता से बेदखल करना है, तो संविधान पर भरोसा रखने वाले सभी दलों को एक मंच पर आना ही होगा।
नई राजनीति की दिशा में बढ़े आगे
गौतम ने मायावती और बसपा सहित अन्य विपक्षी दलों से 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन का हिस्सा बनने की अपील की। उन्होंने कहा कि अब वक्त आ गया है जब उत्तर प्रदेश को न्याय, विकास, समान अवसर और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित एक नई राजनीति की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। राजेंद्र पाल गौतम का मायावती के प्रति यह नरम रुख नया नहीं है।
नहीं हो पाई मायावती से मुलाकात
पिछले महीने 19 मई को जब वे लखनऊ स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में एक कार्यक्रम में शामिल होने आए थे, तब भी राजनीतिक हलचल तेज हो गई थी। उस दौरान वे बाराबंकी के सांसद तनुज पुनिया के साथ अचानक मायावती से मिलने उनके आवास पर पहुंच गए थे। हालांकि, उस दिन मायावती से उनकी आमने-सामने मुलाकात नहीं हो पाई थी, लेकिन इस घटनाक्रम के बाद कयासों का बाजार गर्म हो गया था। तब सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा चलने लगी थी कि क्या वे बसपा में शामिल होने जा रहे हैं?चुनावी रणनीति का हिस्सा
हालांकि, बाद में खुद गौतम ने इस पर सफाई देते हुए कहा था कि वह केवल देश और संविधान की रक्षा के गंभीर मुद्दे पर चर्चा करने के लिए बसपा प्रमुख से मिलना चाहते थे। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपना कांग्रेस की एक सोची-समझी और गहरी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। यूपी में दलित और पिछड़ा वर्ग हमेशा से सत्ता की चाबी रहा है। राजेंद्र पाल दलित समाज में एक मजबूत पकड़ रखते हैं। ऐसे में कांग्रेस उनके जरिए सूबे के दलित वोट बैंक को दोबारा अपने पाले में लाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। अब देखना यह होगा कि गौतम का यह 'मायावती राग' यूपी की राजनीति में क्या नया मोड़ लेकर आता है।