Delimitation Bill: संसद की बैठक दोबारा बुलाए जाने की संभावना को लेकर सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या सरकार परिसीमन से जुड़े विधेयकों को आगे बढ़ाने के लिए मौजूदा सत्र की बैठक फिर बुला सकती है? इसके साथ ही लोकसभा में जरूरी विशेष बहुमत का आंकड़ा भी चर्चा के केंद्र में आ गया है।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बयान के बाद इन अटकलों को और हवा मिली है। हालांकि सरकार की ओर से परिसीमन विधेयक के लिए संसद की बैठक दोबारा बुलाने की कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
अप्रैल में 298 वोट पर अटक गया था संविधान संशोधन
परिसीमन से जुड़े विधायी प्रस्तावों को सरकार अप्रैल में संसद में लेकर आई थी। इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 भी शामिल था। लोकसभा में इस संविधान संशोधन विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े थे। संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो सका। परिसीमन से जुड़े अन्य विधेयकों पर भी इसका सीधा असर पड़ा।
2-तिहाई बहुमत का गणित क्यों महत्वपूर्ण ?
संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए केवल सामान्य बहुमत पर्याप्त नहीं होता। सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई का समर्थन जरूरी होता है। इसके साथ संविधान में निर्धारित कुल सदस्य संख्या से जुड़े बहुमत की शर्त भी पूरी करनी होती है। यही वजह है कि सरकार के लिए केवल NDA की संख्या नहीं, बल्कि मतदान के समय दूसरे दलों और सांसदों का समर्थन भी महत्वपूर्ण होगा।सियासी समीकरण में हुए बदलाव
अप्रैल में हुई वोटिंग के बाद लोकसभा के राजनीतिक समीकरण में कुछ बदलाव हुए हैं। शिवसेना (UBT) के कुछ सांसद शिंदे गुट के साथ गए हैं, जबकि TMC के 20 बागी सांसद NCPI से जुड़ चुके हैं। हालांकि TMC ने इन 20 सांसदों की सदस्यता खत्म करने की मांग करते हुए अयोग्यता याचिकाएं दाखिल की हैं। लोकसभा सचिवालय ने इस मामले में संबंधित सांसदों से जवाब भी मांगा है। ऐसे में इन सांसदों के समर्थन को लेकर अंतिम स्थिति अभी स्पष्ट नहीं मानी जा सकती।
संख्या का मौजूदा गणित
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स्थिति |
संख्या |
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अप्रैल
में विधेयक के पक्ष में वोट |
298 |
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विरोध में
वोट |
230 |
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विशेष
बहुमत |
उपस्थित
और मतदान करने वालों का 2/3 |
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TMC के बागी सांसद |
20 |
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TMC सांसदों की स्थिति |
अयोग्यता
याचिकाएं लंबित |
इस गणित में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आवश्यक वोटों की वास्तविक संख्या उस दिन सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सांसदों की संख्या पर निर्भर करेगी। इसलिए पहले से किसी एक संख्या को अंतिम लक्ष्य मानना सही नहीं होगा।
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क्या फिर बुलाई जा सकती है बैठक ?
संसद का सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने और सत्र के औपचारिक अवसान में अंतर होता है। यदि सत्र का औपचारिक अवसान नहीं हुआ है तो उसी सत्र के तहत सदन की बैठक फिर बुलाए जाने की संवैधानिक-संसदीय गुंजाइश रहती है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार इस विकल्प का इस्तेमाल करेगी या नहीं। परिसीमन से जुड़े विधेयकों को लेकर कोई नई बैठक होती है तो नजर सिर्फ सरकार की रणनीति पर नहीं, बल्कि सदन में बनने वाले नए संख्या समीकरण पर भी रहेगी।दूसरे दलों के समर्थन पर नजर
सियासी चर्चाओं में अब उन विपक्षी और गैर-NDA दलों की भूमिका पर भी नजर है, जो किसी खास विधेयक पर सरकार का समर्थन कर सकते हैं। DMK समेत विभिन्न दलों के रुख को लेकर राजनीतिक अटकलें जरूर हैं, लेकिन समर्थन को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं होने तक इसे तय समीकरण नहीं माना जा सकता।