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मेंटल हेल्थ विशेषज्ञ से परामर्श लेते मरीज
मेंटल हेल्थ विशेषज्ञ से परामर्श लेते मरीज
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एरवाड़ी हादसा : मानसिक बीमारी और सिस्टम की सबसे दर्दनाक कहानी

तमिलनाडु के एरवाड़ी में 6 अगस्त 2001 को एक अवैध मेंटल होम में आग लगने से जंजीरों में बंधे 28 मानसिक रोगियों की मौत हो गई थी। इस हादसे ने देश की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था, इलाज की कमी और अंधविश्वास की गंभीर समस्या को उजागर किया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 के जरिए मानसिक रोगियों के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा दी गई।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
27 Jul 2026, 01:01 PM
तमिलनाडु

भारत में एक समय ऐसा भी था जब मानसिक बीमारी को इलाज की जरूरत वाली स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि अंधविश्वास और सामाजिक कलंक से जोड़कर देखा जाता था। मानसिक बीमारी से जूझ रहे लोगों को कई जगहों पर जंजीरों से बांधकर रखा जाता था, ताकि वे कहीं भाग न जाएं या दूसरों को नुकसान न पहुंचा सकें। इसी सोच ने 6 अगस्त 2001 को तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले के एरवाड़ी गांव में एक ऐसी दर्दनाक घटना को जन्म दिया, जिसे आज भी भारत के मानसिक स्वास्थ्य इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में गिना जाता है। एरवाड़ी गांव में स्थित एक निजी मानसिक आश्रय गृह (मेंटल होम) में रात के समय अचानक आग लग गई। उस समय झोपड़ीनुमा कमरे के अंदर 45 मानसिक रोगी मौजूद थे।

6 अगस्त 2001 की भयावह रात

 इनमें से अधिकांश मरीज लोहे की जंजीरों से बिस्तरों या खंभों से बंधे हुए थे। आग तेजी से फैलती गई, लेकिन जो लोग मजबूती से बंधे थे, वे खुद को छुड़ा नहीं सके। कुछ मरीज जिनकी जंजीरें ढीली थीं, वे किसी तरह बाहर निकल गए, लेकिन 28 लोग वहीं आग की लपटों में जिंदा जल गए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। साइकायट्रिस्ट डॉ. चर्वी कालरा के अनुसार, एरवाड़ी लंबे समय से एक ऐसी जगह मानी जाती थी, जहां मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों के ठीक होने की मान्यता थी। इसी विश्वास के कारण देशभर से परिवार अपने मरीजों को वहां लेकर आने लगे।

कैसे बने ऐसे अवैध मेंटल होम्स

समय के साथ वहां कई बिना लाइसेंस वाले छोटे-छोटे मानसिक आश्रय गृह खुल गए। इन संस्थानों में मरीजों के इलाज के बजाय उन्हें दिन में पेड़ों से और रात में बिस्तरों से जंजीरों में बांधकर रखा जाता था। चिकित्सा सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं और मरीजों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। एरवाड़ी हादसे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) लिया। अदालत के हस्तक्षेप के बाद एक सप्ताह के भीतर ऐसे कई अवैध मेंटल होम्स को बंद कराया गया। लगभग 500 से अधिक मानसिक रोगियों को सरकारी देखरेख और उपचार केंद्रों में स्थानांतरित किया गया। 

मानसिक बीमार व्यक्ति को बांधना गैर कानूनी
जंजीरों में कैद जिंदगी, इलाज से दूर उम्मीद

मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 ने बदली तस्वीर

इस घटना ने सरकार को मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर किया और आने वाले वर्षों में कई सुधारात्मक कदम उठाए गए। इस त्रासदी के वर्षों बाद भारत में मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 लागू किया गया। इस कानून के तहत मानसिक बीमारी से पीड़ित किसी भी व्यक्ति को जंजीरों या बेड़ियों में बांधकर रखना पूरी तरह गैरकानूनी माना गया। साथ ही मरीजों के सम्मान, गरिमा, इलाज के अधिकार और मानवाधिकारों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई। इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि मानसिक रोगियों के साथ इंसानों जैसा व्यवहार हो और उन्हें उचित चिकित्सा सुविधाएं मिलें।

उस परिवार की जगह आप क्या करते

डॉ. चर्वी कालरा इस घटना का जिक्र करते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती हैं। अगर आपके घर में कोई मानसिक बीमारी से जूझ रहा हो, सबसे नजदीकी साइकायट्रिस्ट 200 किलोमीटर दूर हो, इलाज के लिए महीनों का इंतजार करना पड़े और आपको यह भी न पता हो कि मानसिक बीमारी का सही इलाज क्या है, तो आप क्या करेंगे? ऐसे हालात में अधिकांश परिवार वहीं जाते हैं, जहां उन्हें कोई उम्मीद दिखाई देती है, चाहे वह वैज्ञानिक रूप से सही हो या नहीं।

असली समस्या अंधविश्वास नहीं

डॉ. चर्वी का कहना है कि एरवाड़ी की घटना केवल अंधविश्वास की कहानी नहीं थी, बल्कि यह स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी का परिणाम भी थी। जब लोगों तक वैज्ञानिक इलाज नहीं पहुंचता, तब वे मजबूरी में वैकल्पिक और कई बार खतरनाक तरीकों की ओर चले जाते हैं। इसलिए इस हादसे को केवल सामाजिक अज्ञानता से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह देश की मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करता है।

भारत में साइकायट्रिस्ट की भारी कमी

मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। डॉ. चर्वी कालरा के मुताबिक, भारत में प्रति एक लाख आबादी पर औसतन केवल 0.75 साइकायट्रिस्ट उपलब्ध हैं। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार प्रति एक लाख लोगों पर कम से कम 3 साइकायट्रिस्ट होने चाहिए। देश में लगभग 9,000 साइकायट्रिस्ट हैं और इनमें से करीब 80 प्रतिशत बड़े शहरों में कार्यरत हैं। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए विशेषज्ञ तक पहुंचना आज भी बेहद कठिन है।

जरूरतमंदों तक इलाज नहीं पहुंचता

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जिन लोगों को सबसे अधिक उपचार की आवश्यकता होती है, वे अक्सर इलाज तक पहुंच ही नहीं पाते। दूरी, आर्थिक स्थिति, जागरूकता की कमी और सामाजिक शर्मिंदगी जैसी वजहें लोगों को समय पर मदद लेने से रोकती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बीमारी धीरे-धीरे गंभीर रूप ले लेती है और मरीज के साथ पूरा परिवार प्रभावित होता है।

मरने की असली वजह साइकायट्रिस्ट की कमी है
समय पर इलाज से बदल सकती है जिंदगी

मेंटल हेल्थ पर खुलकर बात नहीं

नई दिल्ली स्थित तुलसी हेल्थकेयर के सीईओ और वरिष्ठ साइकायट्रिस्ट डॉ. गौरव गुप्ता का कहना है कि मानसिक बीमारी को आज भी कई लोग कमजोरी, तनाव या जरूरत से ज्यादा सोचने की आदत मान लेते हैं। इसी वजह से मरीज और उनके परिवार विशेषज्ञ की मदद लेने में देर कर देते हैं। यदि मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं आसानी से उपलब्ध हों और समाज में जागरूकता बढ़े, तो लाखों लोगों की जिंदगी बेहतर बनाई जा सकती है।

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

डॉ. गौरव गुप्ता के अनुसार यदि किसी व्यक्ति में लगातार दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक उदासी, अत्यधिक चिंता, चिड़चिड़ापन, रोजमर्रा के कामों में रुचि खत्म होना, नींद या खाने की आदतों में बदलाव, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, लोगों से दूरी बनाना, बिना कारण थकान महसूस होना या खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार आने लगें, तो इसे सामान्य तनाव समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे संकेत मानसिक बीमारी की ओर इशारा कर सकते हैं और समय रहते विशेषज्ञ से परामर्श लेना बेहद जरूरी होता है।

समय पर इलाज, बेहतर जिंदगी

मानसिक बीमारी भी अन्य शारीरिक बीमारियों की तरह एक चिकित्सकीय स्थिति है, जिसका समय पर इलाज संभव है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती चरण में सही उपचार मिलने से मरीज सामान्य जीवन जी सकता है और उसकी जीवन गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है। यदि मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आपके काम, रिश्तों या दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही हैं, तो बिना देर किए किसी प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। याद रखें, मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि अपने स्वास्थ्य और जीवन के प्रति जिम्मेदारी और साहस का परिचायक है।

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