Forest Department Action: छत्तीसगढ़ के करका जंगल क्षेत्र में अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई की जांच करने पहुंची वन विभाग की टीम को ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ा। वन विभाग के अनुसार, मौके पर करीब 50 से 60 ग्रामीण एकत्रित हो गए और टीम की कार्रवाई का विरोध करने लगे। इस दौरान विवाद की स्थिति बनी और धक्का-मुक्की तक की नौबत आ गई। हालांकि, घटना में किसी भी वन अधिकारी या कर्मचारी के घायल होने की जानकारी नहीं मिली है। जानकारी के अनुसार, वन विभाग की टीम करका क्षेत्र में वनभूमि पर अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई की जांच के लिए पहुंची थी। टीम जब मौके पर निरीक्षण और कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ा रही थी, तभी बड़ी संख्या में ग्रामीण वहां पहुंच गए।
विभाग का आरोप है कि ग्रामीणों ने सरकारी कर्मचारियों को उनके काम से रोकने की कोशिश की। इसी दौरान मौके पर माहौल तनावपूर्ण हो गया और दोनों पक्षों के बीच बहस के साथ धक्का-मुक्की की स्थिति बनी। वन विभाग ने बताया कि इस दौरान ग्रामीण मुकेश मरकाम को मौके से ले जाया गया। विभाग के मुताबिक, मुकेश द्वारा पूरी घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की गई थी। मामले से जुड़े वीडियो और अन्य साक्ष्यों के साथ थाना खल्लारी में एफआईआर दर्ज करने के लिए आवेदन दिया गया है।
करका में पहले भी सामने आया है वनभूमि विवाद
करका क्षेत्र में वनभूमि को लेकर विवाद नया नहीं है। यह इलाका पहले एक वन ग्राम के रूप में जाना जाता था और सोंढूर बांध के कैचमेंट क्षेत्र में आता था। सोंढूर बांध निर्माण के बाद 1980 के दशक में करका गांव का विस्थापन किया गया था। विभागीय रिकॉर्ड के अनुसार, गांव के 55 लोगों को जल संसाधन विभाग की ओर से मुआवजा दिया गया था। वन विभाग का कहना है कि विस्थापन के बाद भी क्षेत्र की वनभूमि पर दोबारा अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई की गतिविधियां सामने आईं। इसके बाद से जंगल की जमीन को लेकर विवाद बना हुआ है।
30 हजार पेड़ों की कटाई के मिले संकेत
वन विभाग के अनुसार, 22 सितंबर 2026 को किए गए निरीक्षण में बड़ी संख्या में पेड़ों को नुकसान पहुंचाने के प्रमाण मिले। जांच के दौरान 1,100 से अधिक पेड़ों पर गर्डलिंग के निशान और कई कटे हुए पेड़ों के ठूंठ मिले। विभाग के प्रारंभिक अनुमान में वर्ष 2016-17 के बीच करीब 30 हजार पेड़-पौधों की कटाई के संकेत मिले हैं। इसके अलावा GPS आधारित जांच में लगभग 35 हेक्टेयर वनभूमि पर अतिक्रमण की आशंका जताई गई है। हालांकि, वन विभाग का कहना है कि जमीन के वास्तविक क्षेत्रफल की पुष्टि DGPS और ड्रोन मैपिंग पूरी होने के बाद ही हो सकेगी। वर्ष 2016 में करका क्षेत्र से जुड़े 22 लोगों के खिलाफ करीब 22 हेक्टेयर वन क्षेत्र में कथित अतिक्रमण को लेकर प्रकरण दर्ज किया गया था। विभाग के अनुसार, वर्ष 2023 में नगरी न्यायालय ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। अब वन विभाग दोबारा सैटेलाइट इमेज, ड्रोन फुटेज, GPS/DGPS मैपिंग और मैदानी जांच के आधार पर पूरे मामले की समीक्षा कर रहा है।वन संरक्षण को लेकर उठे सवाल
करका का मामला केवल जमीन के अतिक्रमण तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र वन्यजीवों और हाथियों के आवागमन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। वन विभाग का कहना है कि जंगल क्षेत्र में लगातार कमी आने से वन्यजीवों के प्राकृतिक रास्ते प्रभावित हो सकते हैं, जिससे भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति बढ़ने की संभावना रहती है। विभाग ने दावा किया है कि पिछले चार वर्षों में करीब 1,050 हेक्टेयर अतिक्रमित वनभूमि को मुक्त कराया गया है। फिलहाल करका में हुई घटना के बाद एक बार फिर वन संरक्षण, अतिक्रमण और स्थानीय विरोध का मुद्दा चर्चा में आ गया है।

