फ्रांस के एवियन शहर में 15 से 17 जून तक आयोजित होने जा रहे G7 शिखर सम्मेलन पर इस बार पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है। आमतौर पर वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, जलवायु परिवर्तन और विकास से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित रहने वाला यह मंच इस बार पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव की वजह से खासा चर्चा में है। ईरान और अमेरिका के बीच हाल के दिनों में बढ़ी तनातनी, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर बढ़ती चिंताओं ने सम्मेलन का एजेंडा बदल दिया है। ऐसे समय में जब दुनिया पहले से ही कई भू-राजनीतिक संकटों का सामना कर रही है, G7 देशों के नेताओं की यह बैठक कई अहम संदेश दे सकती है।
पश्चिम एशिया संकट पर चर्चा
मध्य पूर्व में लगातार बिगड़ते हालात ने वैश्विक समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो उसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, शिपिंग उद्योग और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। फ्रांस समेत कई G7 सदस्य देशों का मानना है कि मौजूदा समय में पश्चिम एशिया की स्थिति दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। यही वजह है कि सम्मेलन में इस विषय पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है।
बातचीत से निकल सकता है समाधान
सम्मेलन से पहले अमेरिका की ओर से संकेत दिए गए हैं कि ईरान के साथ तनाव कम करने की दिशा में सकारात्मक प्रगति हो रही है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद जारी है और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। ईरान ने अभी किसी अंतिम समझौते को लेकर स्पष्ट संकेत नहीं दिए हैं। ऐसे में दुनिया की निगाहें इस बात पर भी टिकी हैं कि G7 मंच पर इस मुद्दे को लेकर क्या नई पहल सामने आती है।
मोदी-ट्रंप मुलाकात पर नजर
G7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच संभावित मुलाकात को भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार दोनों नेताओं के बीच व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, निवेश और वैश्विक संकटों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रणनीतिक संबंधों को देखते हुए यह मुलाकात दोनों देशों के लिए अहम मानी जा रही है।
ग्लोबल साउथ की आवाज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सम्मेलन में भारत के साथ-साथ ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाएंगे। रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया के कई विकासशील देश जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, लेकिन वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत कम रहती है। भारत इस मंच पर उन देशों की चिंताओं और अपेक्षाओं को मजबूती से रखने का प्रयास करेगा।
कई वैश्विक नेताओं से होगी चर्चा
सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी की फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी समेत कई प्रमुख नेताओं से मुलाकात होने की संभावना है। ये बैठकें भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका और कूटनीतिक सक्रियता को और मजबूत कर सकती हैं।
केवल पश्चिम एशिया पर चर्चा नहीं
G7 सम्मेलन में यूक्रेन युद्ध, वैश्विक व्यापार संतुलन, ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला, महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की उपलब्धता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और जलवायु परिवर्तन जैसे विषय भी एजेंडे में शामिल हैं। मौजूदा हालात को देखते हुए पश्चिम एशिया का संकट अन्य सभी मुद्दों पर भारी पड़ता दिखाई दे रहा है।
दुनिया देख रही है G7 की ओर
यदि अमेरिका और ईरान के बीच किसी प्रकार की सकारात्मक प्रगति होती है तो उसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक तेल कीमतों, समुद्री व्यापार मार्गों, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता आने की संभावना बढ़ सकती है। यही कारण है कि फ्रांस में होने वाला यह G7 शिखर सम्मेलन केवल सात देशों की बैठक नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण मंच के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले तीन दिनों में होने वाली चर्चाओं और बैठकों पर पूरी दुनिया की नजर बनी रहेगी।
