मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार गहराता जा रहा है। अमेरिकी सेना ने रविवार सुबह ईरान के दो हमलावर ड्रोन को मार गिराने का दावा किया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार ये दोनों वन-वे अटैक ड्रोन थे, जो रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय समुद्री यातायात के लिए खतरा पैदा कर रहे थे। इस घटना के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई हैं और क्षेत्रीय संघर्ष के और विस्तार की आशंका जताई जा रही है।
होर्मुज में अमेरिकी कार्रवाई
बढ़ रहा है अमेरिका और ईरान का टकराव
पिछले कुछ महीनों से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी, ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सहयोगी देशों की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की निगरानी जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच टकराव बना हुआ है। ड्रोन को मार गिराने की यह घटना केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का संकेत है। अमेरिका जहां अपने सहयोगी देशों और समुद्री मार्गों की सुरक्षा की बात कर रहा है, वहीं ईरान लगातार अमेरिकी सैन्य गतिविधियों पर सवाल उठा रहा है।
कुवैत और बहरीन पर हमले की आशंका
खाड़ी देशों में हाई अलर्ट
ड्रोन घटना के बाद कई खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत कर दी है। समुद्री मार्गों, तेल प्रतिष्ठानों और सैन्य ठिकानों की निगरानी बढ़ा दी गई है। क्षेत्र में तैनात अमेरिकी और सहयोगी देशों की सेनाएं भी हाई अलर्ट पर हैं। यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता पर पड़ सकता है। इससे तेल की कीमतों में उछाल, समुद्री व्यापार में बाधा और क्षेत्रीय सुरक्षा संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।
वैश्विक बाजारों की नजर
दुनिया भर के निवेशक और ऊर्जा बाजार इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी प्रकार की सैन्य झड़प वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है।
स्थिति पर दुनिया की नजर
फिलहाल अमेरिकी सेना ने स्पष्ट कर दिया है कि वह क्षेत्र में किसी भी खतरे का जवाब देने के लिए तैयार है। दूसरी ओर ईरान की ओर से इस ड्रोन कार्रवाई पर विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। आने वाले दिनों में दोनों देशों के कदम यह तय करेंगे कि तनाव कूटनीतिक स्तर पर सुलझेगा या फिर क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और बढ़ेंगी।