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चिनाब-ब्यास लिंक टनल की डेडलाइन तय
चिनाब-ब्यास लिंक टनल की डेडलाइन तय
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जल संकट का डर : भारत ने तय की चिनाब-ब्यास लिंक टनल की डेडलाइन, बदल जाएगा नदियों का भूगोल!

भारत सरकार ने ₹2,352 करोड़ की महत्वाकांक्षी चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना को 31 जुलाई 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया है। हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में बनने वाली यह परियोजना चिनाब नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास बेसिन में मोड़ने का काम करेगी।

कीर्तिमान न्यूज
01 Jun 2026, 11:43 AM
नई दिल्ली

भारत सरकार ने अपनी जल और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने चिनाब नदी के अतिरिक्त पानी को ब्यास बेसिन में मोड़ने के लिए 31 जुलाई 2029 की समय सीमा (डेडलाइन) तय कर दी है। लगभग ₹2,352 करोड़ की यह महत्वाकांक्षी 'चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना' हिमाचल प्रदेश के दुर्गम लाहौल-स्पीति जिले में आकार लेगी।

इस गेम-चेंजर प्रोजेक्ट के पूरा होने से पाकिस्तान की ओर बहकर जाने वाले पानी के प्रवाह में बड़ी कमी आएगी, जबकि भारत के उत्तरी राज्यों को इसका सीधा फायदा मिलेगा।

8.7 किमी लंबी सुरंग और 19 मीटर ऊंचा बैराज

सीएनएन न्यूज-18 की रिपोर्ट के अनुसार, यह 'लिंक-3 परियोजना' हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत लाहौल घाटी में चिनाब नदी पर प्रस्तावित है। इस पूरी परियोजना की इंजीनियरिंग रूपरेखा बेहद आधुनिक है:

  • मुख्य ढांचा: चिनाब नदी पर 19 मीटर ऊंचा एक बैराज और वाटर इंटेक सिस्टम बनाया जाएगा।

  • सुरंग की लंबाई: नदी के अतिरिक्त पानी को मोड़ने के लिए 8.7 किलोमीटर लंबी जल परिवहन सुरंग (Water Conveyance Tunnel) का निर्माण किया जाएगा।

  • लोकेशन: यह जलमार्ग परिवर्तन स्थल लाहौल के कोसकर गांव के पास और प्रसिद्ध अटल टनल (रोहतांग) के उत्तरी प्रवेश द्वार के ठीक ऊपर (अपस्ट्रीम) स्थित होगा।

  • दूसरा चरण: परियोजना के दूसरे चरण में बड़े पैमाने पर जलविद्युत (Hydroelectric) उत्पादन की भी योजना है।

रणनीतिक रूप से क्यों अहम है यह फैसला?

परियोजना से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट सिर्फ इंजीनियरिंग या बिजली पैदा करने तक सीमित नहीं है। यह रणनीतिक रूप से भारत की 'वॉटर डिप्लोमेसी' का हिस्सा है।

"इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी नदियों के जल के उपयोग को भारत के हित में अनुकूलित (Optimize) करना है, ताकि एक-एक बूंद पानी का सही इस्तेमाल देश के भीतर हो सके।"

सिंधु जल संधि और भारत का कड़ा रुख

वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) के तहत चिनाब को एक 'पश्चिमी नदी' माना गया था, जिसके अधिकांश पानी पर पाकिस्तान का हक था और पाकिस्तान इसका उपयोग अपनी विशाल नहरों के जरिए सिंचाई के लिए करता था।

लेकिन, जम्मू-कश्मीर में हुए लगातार आतंकी हमलों (जैसे पहलगाम हमला) के बाद भारत सरकार ने अपनी नीति में आक्रामक बदलाव किया है। संधि को पूरी तरह रद्द किए बिना, भारत अब इसके सख्त प्रावधानों और तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए पाकिस्तान को नोटिस दे चुका है और संधि के दायरे में रहते हुए अपने पानी के 'अधिकतम उपयोग' (Maximum Utilization) की नीति पर काम कर रहा है। यह टनल उसी रणनीति का नतीजा है।

इस महापरियोजना से किसे क्या मिलेगा?

इस परियोजना के पूरे होने से भारत के बिजली और कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद है:

प्रभावित क्षेत्र/राज्यहोने वाला मुख्य लाभ
पावर सेक्टर (बिजली)परियोजना के पूर्ण होने पर लगभग 4,000 मेगावाट (MW) अतिरिक्त पनबिजली का उत्पादन होगा।
पंजाब और हरियाणाब्यास बेसिन में पानी बढ़ने से इन राज्यों के खेतों को सिंचाई के लिए भरपूर पानी मिलेगा।
राजस्थानमरुस्थलीय इलाकों में पेयजल (Drinking Water) और इंदिरा गांधी नहर प्रणाली को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी।
पाकिस्तानचिनाब का अतिरिक्त पानी रुकने से पाकिस्तान के निचले इलाकों में पानी की किल्लत बढ़ सकती है।

भारत की जल संप्रभुता की ओर बढ़ते कदम

चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना यह साफ संदेश देती है कि भारत अब अपनी नदियों के पानी को यूं ही बहकर पाकिस्तान जाने देने के मूड में नहीं है। सुरंगों के माध्यम से पानी को अपनी ओर मोड़ने के इस फैसले से न केवल भारत की जल और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि यह सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारत के 'अघोषित जल-जवाब' के रूप में भी देखा जा रहा है। 2029 तक इस परियोजना का पूरा होना भारतीय बुनियादी ढांचे के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।

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