महासमुंद जिले में सामने आए करीब 1.5 करोड़ रुपये के एलपीजी गैस गबन मामले की जांच अब नए चरण में पहुंच गई है। पुलिस केवल मुख्य आरोपियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों की भूमिका भी खंगाल रही है जिन्होंने फरार आरोपियों को किसी भी तरह का संरक्षण या सहायता पहुंचाई। इसी सिलसिले में मुंबई के चार लोगों को नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए बुलाया गया था। गुरुवार को सभी चारों महासमुंद पहुंचे, जहां पुलिस ने उनसे कई घंटे तक विस्तार से पूछताछ की।
मुंबई के चार लोगों से पूछताछ पुलिस के मुताबिक, ठाकुर पेट्रोकेमिकल के संचालक संतोष सिंह ठाकुर और डायरेक्टर सार्थक सिंह ठाकुर की फरारी के दौरान कथित तौर पर सहयोग करने वाले जोगेंद्र सिंह, राजू माइकल, राकेश साह और प्रशांत पाटिल को 22 जून को नोटिस जारी किया गया था।
92 मीट्रिकटन एलपीजी गैस बेचे गए
छह गैस कैप्सूलों से करीब 92 मीट्रिक टन एलपीजी गैस निकालकर लगभग 90 लाख रुपये में बेच दी गई थी। आरोप है कि बाद में पूरे मामले को वैध रूप देने के लिए फर्जी दस्तावेज और पंचनामा तैयार किए गए, ताकि रिकॉर्ड में कोई गड़बड़ी दिखाई न दे। गैस का आकलन और साजिश पुलिस के अनुसार, 26 मार्च को तत्कालीन खाद्य अधिकारी अजय यादव और भाजपा नेता पंकज चंद्राकर गैस की मात्रा का आकलन करने सिंघोड़ा थाना पहुंचे थे। वहां छह गैस कैप्सूलों में लगभग 105 मीट्रिक टन एलपीजी होने की जानकारी मिली।

गैस एजेंसी संचालकों से संपर्क
एक करोड़ की बातचीत, 90 लाख में तय हुआ सौदा जांच में यह भी सामने आया है कि गैस एजेंसी संचालकों से संपर्क के बाद रायपुर निवासी मनीष चौधरी के माध्यम से ठाकुर पेट्रोकेमिकल से बातचीत शुरू हुई। शुरुआत में करीब एक करोड़ रुपये में सौदे की चर्चा हुई थी, लेकिन बाद में यह सौदा 90 लाख रुपये में तय होने की बात सामने आई है। रकम के बंटवारे का भी दावा पुलिस का कहना है कि इस सौदे से मिली रकम का बड़ा हिस्सा तत्कालीन खाद्य अधिकारी अजय यादव तक पहुंचा, जबकि बाकी राशि अलग-अलग लोगों के बीच बांटी गई
फर्जी पंचनामा और रिकॉर्ड में गड़बड़ी
उस समय न तो वास्तविक मालिक मौजूद थे और न ही कोई स्वतंत्र गवाह। इसके बावजूद खाद्य विभाग कार्यालय में पंचनामा तैयार कर उसे आधिकारिक दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। दस्तावेजों में मिली कई दस्तवेजो में गड़बड़ियां पुलिस की जांच में पंचनामा, समय और वजन कांटे के रिकॉर्ड में कई गंभीर सामने गड़बड़ियां आई हैं। अधिकारियों का मानना है कि इन तथ्यों से दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा और कूट रचना किए जाने की आशंका और मजबूत होती है।
