Nobel Peace Prize: दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में शुमार 'नोबेल शांति पुरस्कार' के लिए इस साल दक्षिण अफ्रीका की प्रख्यात मानवाधिकार वकील नवनेथम "नावी" पिल्लई के नाम पर मुहर लगी है। नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में शुक्रवार को नोबेल जूरी ने औपचारिक ऐलान करते हुए उनके दशकों लंबे मानवाधिकार और न्याय के संघर्ष को सराहा। वहीं दूसरी ओर, इस सर्वोच्च सम्मान की दौड़ में शामिल पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक बार फिर निराशा का सामना करना पड़ा है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों को दी नई दिशा
नावी पिल्लई का पूरा जीवन युद्ध अपराधों, नरसंहार और सामाजिक असमानता के खिलाफ लड़ाई में बीता है। नोबेल कमेटी के अनुसार, यह सम्मान उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने और दुनिया भर में दबे-कुचले लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए दिया जा रहा है।
पिल्लई ने वकालत को सिर्फ अदालती कमरों तक सीमित न रखकर इसे नस्लभेद और मानवाधिकार हनन के खिलाफ एक मजबूत हथियार बनाया। अपने शुरुआती दिनों में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद विरोधी आंदोलन के दौर में नेल्सन मंडेला सहित कई प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं का कोर्ट में बचाव किया था।
ऐतिहासिक उपलब्धियां और संयुक्त राष्ट्र में सफर
नावी पिल्लई का करियर कई ऐतिहासिक मील के पत्थरों से भरा रहा है:
पहली अश्वेत महिला जज: वर्ष 1995 में उन्हें दक्षिण अफ्रीका के हाईकोर्ट में कार्यवाहक जज नियुक्त किया गया था। इस पद तक पहुँचने वाली वह देश की पहली अश्वेत महिला थीं।
वैश्विक संगठन की स्थापना: महिलाओं के अधिकारों को वैश्विक स्तर पर मजबूती देने के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संगठन 'इक्वैलिटी नाउ' (Equality Now) की सह-स्थापना की।
संयुक्त राष्ट्र में भूमिका: पिल्लई ने साल 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (UN High Commissioner for Human Rights) के रूप में अपनी सेवाएँ दीं, जहाँ उन्होंने दुनिया भर के तनावग्रस्त इलाकों में शांति और न्याय की वकालत की।
ट्रंप का दावा फिर खारिज, नोबेल का सपना अधूरा
दूसरी तरफ, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर यह सम्मान पाने से चूक गए। ट्रंप लंबे समय से खुद को इस पुरस्कार का सबसे मजबूत दावेदार बताते रहे हैं। पुरस्कार की घोषणा से ठीक एक दिन पहले ही उन्होंने सार्वजनिक बयान में दावा किया था कि उन्होंने दुनिया भर में 8 युद्ध रुकवाए हैं और वे किसी तरह की डींगें नहीं मार रहे हैं।
इसके बावजूद, नोबेल कमेटी की सूची में उनकी दावेदारी जगह नहीं बना सकी। पिछले कुछ वर्षों की तरह इस बार भी ट्रंप की नोबेल शांति पुरस्कार पाने की हसरत अधूरी ही रह गई।
