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बूंद-बूंद पानी के लिए भीषण संघर्ष
बूंद-बूंद पानी के लिए भीषण संघर्ष
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दावों की खुली पोल : मुरैना के आदिवासी गांवों में बूंद-बूंद को तरस रहे लोग, 45°C की तपिश में घड़ा ढो रही हैं महिलाएं

मुरैना के बहेरी समेत आसपास के पांच गांवों में जल संकट गंभीर रूप ले चुका है। गर्मी और मानसून दोनों मौसमों में ग्रामीणों को पीने के पानी के लिए कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। कई बार उन्हें गंदे गड्ढों और नालों का पानी पीने को मजबूर होना पड़ता है, जिससे डायरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियां फैल रही हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से तत्काल समाधान की मांग करते हुए आंदोलन की चेतावनी दी है।

कीर्तिमान न्यूज
30 May 2026, 09:56 AM
मुरैना

एक तरफ जहां मध्य प्रदेश का जिला प्रशासन 'जल जीवन मिशन' के तहत 'हर घर जल' पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, वहीं मुरैना के सीमावर्ती आदिवासी अंचलों से आई तस्वीरें इन दावों की हकीकत बयां करने के लिए काफी हैं। आजादी के दशकों बाद भी यहाँ के ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए भीषण संघर्ष कर रहे हैं।

चिलचिलाती धूप और 45 डिग्री की जानलेवा गर्मी के बीच बरखेड़ा ग्राम पंचायत के बहेरी समेत आसपास के पांच गांवों में जल संकट गहरा गया है। स्थिति इतनी बदतर है कि मासूम बच्चे और बुजुर्ग महिलाएं कई किलोमीटर का पथरीला सफर तय कर पानी लाने को मजबूर हैं।

प्रशासन की बेरुखी और बीमारी का तांडव

ग्रामीणों से मिली ताज़ा जानकारी के अनुसार, गांव में आज तक पेयजल की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं की गई है। सबसे भयावह स्थिति मानसून के दौरान बनती है।

  • गंदे गड्ढों का पानी पीने की मजबूरी: गर्मियों में ग्रामीण जैसे-तैसे दूर-दराज के कुओं से पानी ले आते हैं, लेकिन मानसून शुरू होते ही रास्ते कीचड़ और मलबे से बंद हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में पूरा गांव नालों और गंदे गड्ढों में जमा दूषित पानी पीने को विवश हो जाता है।

  • गंभीर बीमारियों से मौतें: ग्रामीणों का आरोप है कि दूषित पानी पीने की वजह से हर साल गांव में डायरिया, टाइफाइड और पेट जनित महामारियां फैलती हैं। इलाज के अभाव और दूषित जल के सेवन से अब तक कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की नींद फिर भी नहीं खुली है।

दो जिलों की सीमा में उलझा विकास

मुरैना और श्योपुर जिले की सीमा पर बसे बहेरी गांव में करीब 200 आदिवासी परिवार रहते हैं। सीमावर्ती इलाका होने के कारण यह गांव हमेशा से प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार रहा है।

पूरी जिंदगी पानी ढोने में गुजर गई... गांव की रहने वाली दख्खो बाई का दर्द प्रशासनिक दावों पर करारा तमाचा है। उन्होंने बताया, "25 साल पहले जब मैं इस गांव में दुल्हन बनकर आई थी, तब भी पानी की यही किल्लत थी और आज भी हालात जस के तस हैं। मेरी पूरी जवानी और जिंदगी सिर पर घड़े रखकर पानी ढोते-ढोते गुजर गई, लेकिन इस गांव की प्यास आज तक कोई सरकार नहीं बुझा सकी।"

वर्तमान में ग्रामीणों को पानी के लिए मुरैना की सीमा लांघकर श्योपुर जिले की विजयपुर तहसील के बीटा गांव के जंगलों में जाना पड़ता है। वहां बने एक कुएं से ग्रामीण अपनी प्यास बुझा रहे हैं, जो भीषण गर्मी में कभी भी सूख सकता है।

'जल्द समाधान नहीं तो आंदोलन'

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, स्थानीय जन प्रतिनिधियों और पीएचई (PHE) विभाग से तत्काल हैंडपंप सुधारने और 'नल-जल योजना' को धरातल पर उतारने की मांग की है।

ग्रामीणों का कहना है कि अगर बारिश का मौसम शुरू होने से पहले इस समस्या का ठोस समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में स्थिति और अधिक भयावह हो जाएगी। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें शुद्ध पेयजल नहीं मिला, तो वे उग्र आंदोलन और आगामी चुनावों के बहिष्कार के लिए मजबूर होंगे।

मुख्य बिंदु जिन पर प्रशासन को ध्यान देने की जरूरत है:

  • बहेरी समेत 5 गांवों में तत्काल टैंकरों के माध्यम से पानी की सप्लाई।

  • जल जीवन मिशन के तहत अधूरी पड़ी नल-जल योजना की जांच।

  • आगामी बरसात को देखते हुए गांव में मेडिकल कैंप की अग्रिम व्यवस्था।

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