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मटर और सिंघाड़े को मिली पहचान
मटर और सिंघाड़े को मिली पहचान
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मटर और सिंघाड़े : GI टैग  किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा

जबलपुर के मटर और सिंघाड़े को जीआई टैग मिलने से इन उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। इससे किसानों को बेहतर दाम, नकली ब्रांडिंग से सुरक्षा, मार्केटिंग और निर्यात के नए अवसर मिलेंगे,

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
26 Jun 2026, 04:12 PM
जबलपुर

जबलपुर के उत्पादन को अनमोल उपहार मिली है। जबलपुर के मटर और सिंघाड़े को विशेष गुणवत्ता (जीआई) टैग मिला है। जीआई टैग मिलने से जबलपुरी मटर और सिंघाड़े को देश विदेशों में भी एक नई पहचान मिलेगी। इससे किसानों को उत्पादों का बेहतर दाम मिलेगा और उनकी आय बढ़ेगी। साथ ही, "जबलपुरी" नाम को कानूनी संरक्षण मिलने से नकली ब्रांडिंग पर भी रोक लगेगी।

उत्पादों की मार्केटिंग को मिलेगा बढ़ावा

मटर के लिए जबलपुर और सिंघाड़े के लिए सिहोरा एशिया की सबसे बड़ी मंडियों में गिने जाते हैं। इसके बावजूद यहां के किसानों को अपने उत्पादों की सही पहचान और उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। अब जीआई टैग मिलने के बाद मटर और सिंघाड़े की व्यापक स्तर पर मार्केटिंग संभव होगी। इससे किसानों को उनकी फसलों का बेहतर मूल्य मिलेगा। साथ ही, क्षेत्र में खाद्य प्रसंस्करण और अन्य उद्योगों की स्थापना की संभावनाएं भी बढ़ेंगी, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।

किसानों की आय का प्रमुख आधार हैं 

जबलपुर और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान मटर और सिंघाड़े की खेती करते हैं। यह दोनों फसलें यहां के किसानों की आय का मुख्य स्रोत हैं। अब नर्मदा के जल और उपजाऊ मिट्टी से जुड़े इन उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलने के बाद विदेशों में निर्यात के नए अवसर भी खुलेंगे। उल्लेखनीय है कि भारत में पहली बार मटर और सिंघाड़े को जीआई टैग प्रदान किया गया है।

क्या होता है GI टैग?

जीआई (Geographical Indication) टैग किसी उत्पाद को उसकी विशेष भौगोलिक पहचान के आधार पर दिया जाने वाला बौद्धिक संपदा अधिकार है। यह टैग उस उत्पाद की गुणवत्ता, विशिष्टता और पारंपरिक पहचान को प्रमाणित करता है। इसका उद्देश्य किसी विशेष क्षेत्र में बनने वाले उत्पाद को अलग पहचान देना और उसे कानूनी संरक्षण प्रदान करना है। जीआई टैग मिलने के बाद कोई अन्य व्यक्ति या संस्था उस नाम का गलत इस्तेमाल या नकल नहीं कर सकती। इससे उत्पाद को विशिष्ट पहचान मिलती है, बाजार में उसकी मांग बढ़ती है और स्थानीय कारीगरों व किसानों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होते हैं

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