केंद्र सरकार ने डीपफेक और एआई से तैयार की जा रही आपत्तिजनक सामग्री को लेकर सोशल मीडिया कंपनी मेटा से जवाब मांगा है। सरकार यह जांच कर रही है कि मेटा भारतीय कानून के तहत मिलने वाली मध्यस्थ (Intermediary) की जिम्मेदारियों का सही तरीके से पालन कर रहा है या नहीं।
सूत्रों के मुताबिक, मेटा के साथ हुई बैठकों के बाद सरकार आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेगी। मुख्य मुद्दा यह है कि अगर कोई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म यह तय करता है कि किस यूजर को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, तो क्या उसकी भूमिका सिर्फ मध्यस्थ तक सीमित रहती है या वह सामग्री के प्रकाशक की जिम्मेदारी भी निभा रहा है। सरकार का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की अनुशंसा प्रणाली (Recommendation System) यह तय करती है कि किसी व्यक्ति को कौन-सी पोस्ट या वीडियो दिखाई जाएगी। इसके अलावा अगर कोई प्लेटफॉर्म पेड कंटेंट को बढ़ावा देता है, तो उसके मध्यस्थ दर्जे को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
मेटा टीम से हुई दो दिन तक पूछताछ
सूत्रों ने बताया कि सरकार अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों को भी चर्चा के लिए बुलाएगी और यह देखा जाएगा कि वे भारतीय कानूनों के तहत मध्यस्थ की श्रेणी में आते हैं या नहीं। डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) और बिना लेबल वाली एआई जनरेटेड सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने मेटा की टीम के साथ लगातार बैठकें कीं। दो दिन तक कंपनी के अधिकारियों से विस्तृत पूछताछ के बाद तीसरे दिन तकनीकी स्तर पर चर्चा की गई। इन बैठकों में मेटा की ओर से डीपफेक रोकने के लिए उठाए जा रहे कदमों और भविष्य की रणनीति पर जानकारी ली गई। सरकार ने कंपनी को ऐसी सामग्री से निपटने के लिए प्रभावी और ठोस कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।पीएम मोदी की पोस्ट हटने के बाद बढ़ा मामला
मेटा के साथ यह बैठक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक फेसबुक पोस्ट पर अस्थायी रोक लगाए जाने के बाद हुई थी। हालांकि कंपनी ने बाद में इसे कंटेंट फिल्टर की तकनीकी गलती बताते हुए पोस्ट बहाल कर दी थी और इसके लिए माफी भी मांगी थी। सरकार अब यह सुनिश्चित करना चाहती है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एआई आधारित गलत सामग्री, डीपफेक और अन्य संवेदनशील कंटेंट को लेकर अपनी जिम्मेदारियों का गंभीरता से पालन करें।