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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए हुए चुनाव
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए हुए चुनाव
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सुरक्षा परिषद चुनाव : जर्मनी की हार, भारत की स्थायी सदस्यता मुहिम के लिए भी संकेत

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता के लिए हुए चुनाव में जर्मनी को बड़ा झटका लगा है। पश्चिमी यूरोप और अन्य समूह की दो सीटों के लिए हुए मतदान में जर्मनी केवल 104 वोट हासिल कर सका, जबकि पुर्तगाल को 134 और ऑस्ट्रिया को 131 वोट मिले। दो-तिहाई बहुमत नहीं मिलने के कारण जर्मनी अगले दो वर्षों के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता हासिल करने में विफल रहा।

प्रकाशित: 04 Jun 2026, 11:10 AM · अपडेट: 15 Sep 2026, 12:46 PM
न्यूयॉर्क
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता के लिए हुए चुनाव में जर्मनी को बड़ा झटका लगा है। 'पश्चिमी यूरोप और अन्य समूह' (WEOG) की दो सीटों के लिए हुए मतदान में जर्मनी ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल से पीछे रह गया। जहां पुर्तगाल को 134 और ऑस्ट्रिया को 131 वोट मिले, वहीं जर्मनी केवल 104 वोट ही हासिल कर सका। इस हार के साथ जर्मनी का अगले दो वर्षों के लिए सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बनने का सपना टूट गया है यह परिणाम संयुक्त राष्ट्र में सुधार और सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग कर रहे देशों, विशेषकर भारत, के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत है।

जर्मनी को बड़ा झटका

संयुक्त राष्ट्र महासभा में बुधवार को सुरक्षा परिषद की पांच अस्थायी सीटों के लिए मतदान हुआ। इन सीटों के लिए विभिन्न क्षेत्रीय समूहों से उम्मीदवार मैदान में थे। पश्चिमी यूरोप और अन्य देशों के समूह (WEOG) की दो सीटों पर जर्मनी, ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल के बीच मुकाबला था। मतदान के दौरान सदस्य देशों ने ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल को प्राथमिकता दी। पुर्तगाल को 134 और ऑस्ट्रिया को 131 वोट मिले, जबकि जर्मनी को केवल 104 वोट प्राप्त हुए। आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल न कर पाने के कारण जर्मनी चुनाव हार गया।

विदेश मंत्री ने जताई निराशा

चुनाव परिणाम आने के बाद जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वेडेफुल ने इस नतीजे को निराशाजनक बताया। उन्होंने कहा कि जर्मनी ने वैश्विक स्तर पर शांति, सुरक्षा और बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम किया है, ऐसे में यह परिणाम उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा। उन्होंने यह भी कहा कि जर्मनी संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अपनी सक्रिय भूमिका जारी रखेगा।

अस्थायी सदस्यता महत्वपूर्ण

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं— संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस ,चीन, यूनाइटेड किंगडम और फ्रांस। इनके अलावा 10 अस्थायी सदस्य होते हैं, जिन्हें क्षेत्रीय आधार पर दो वर्ष के लिए चुना जाता है। अस्थायी सदस्य देशों को वैश्विक सुरक्षा, शांति अभियानों, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय संकटों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतदान का अधिकार मिलता है। इसलिए यह सदस्यता किसी भी देश की कूटनीतिक प्रतिष्ठा के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।

भारत की स्थायी सदस्यता 

जर्मनी की हार को केवल एक चुनावी पराजय के रूप में नहीं देखा जा रहा है। जर्मनी लंबे समय से भारत, जापान और ब्राजील के साथ मिलकर सुरक्षा परिषद में सुधार और स्थायी सदस्यता विस्तार की मांग करता रहा है। यह समूह आमतौर पर "जी-4" (G-4) देशों के नाम से जाना जाता है। भारत भी वर्षों से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक कूटनीति में बढ़ती भूमिका के बावजूद भारत अभी तक सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन सका है। जर्मनी को अपेक्षा से कम समर्थन मिलना यह संकेत देता है कि संयुक्त राष्ट्र के भीतर शक्ति संतुलन और क्षेत्रीय राजनीति अभी भी सदस्य देशों के निर्णयों को प्रभावित कर रही है। इससे सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया और जटिल हो सकती है।

वैश्विक राजनीति 

विश्लेषकों के अनुसार यह चुनाव परिणाम अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बदलते समीकरणों को भी दर्शाता है। यूरोप के प्रभावशाली देशों में शामिल होने के बावजूद जर्मनी का पर्याप्त समर्थन हासिल न कर पाना बताता है कि विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में किसी भी देश के लिए केवल आर्थिक या राजनीतिक ताकत ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यापक कूटनीतिक समर्थन जुटाना भी उतना ही जरूरी है।

बहुपक्षीय सहयोग

जर्मनी भले ही इस बार सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता हासिल नहीं कर पाया हो, लेकिन वह संयुक्त राष्ट्र सुधार और बहुपक्षीय सहयोग के मुद्दों पर अपनी सक्रिय भूमिका बनाए रखेगा। वहीं भारत सहित जी-4 देशों की नजर अब सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार और स्थायी सदस्यता विस्तार की दिशा में होने वाली आगामी चर्चाओं पर रहेगी।
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