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टाटा सिंगूर परियोजना
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टाटा सिंगूर परियोजना वापसी : बंगाल सरकार के साथ बातचीत शुरू, किसानों में जगी रोजगार की उम्मीद

पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा समूह की संभावित वापसी को लेकर चर्चा तेज हो गई है। उद्योग मंत्री तापस रॉय ने बताया कि कंपनी के साथ शुरुआती स्तर पर बातचीत जारी है। वहीं, लंबे समय से प्रभावित किसान अब दोबारा उद्योग आने और रोजगार मिलने की उम्मीद जता रहे हैं।

विशेष संवाददाता
12 Jul 2026, 12:36 PM
कोलकाता

पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा समूह की संभावित वापसी की चर्चा एक बार फिर तेज हो गई है। करीब 20 साल पहले नैनो परियोजना को लेकर शुरू हुआ विवाद अब नए मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। राज्य के उद्योग मंत्री तापस रॉय ने कहा है कि टाटा समूह के साथ शुरुआती स्तर पर बातचीत चल रही है। हालांकि अभी किसी अंतिम फैसले की घोषणा नहीं हुई है।

राज्य के उद्योग मंत्री तापस रॉय ने कहा कि यदि टाटा समूह सिंगूर लौटने के लिए तैयार होता है, तो वहां किसी दूसरी कंपनी को नहीं लाया जाएगा। उन्होंने बताया कि बातचीत शुरुआती चरण में है। इसलिए अंतिम निर्णय होने तक इंतजार करना होगा। इसके अलावा उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी इस पूरे मामले की स्वयं निगरानी कर रहे हैं।

क्या है सिंगूर विवाद का पूरा मामला

साल 2006 में टाटा समूह ने सिंगूर में छोटी कार परियोजना शुरू करने की योजना बनाई थी। इसके लिए बड़ी मात्रा में कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया था। हालांकि भूमि अधिग्रहण को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। इसके बाद विवाद लगातार बढ़ता गया। नतीजतन टाटा समूह ने परियोजना सिंगूर से हटाकर गुजरात के साणंद स्थानांतरित कर दी।

यही वजह है कि सिंगूर का मामला आज भी राज्य की राजनीति और औद्योगिक विकास की बड़ी घटनाओं में गिना जाता है।

किसानों का दर्द अब भी बरकरार

परियोजना बंद होने के बाद हजारों परिवार प्रभावित हुए। कई परिवार आर्थिक और मानसिक कठिनाइयों से गुजरते रहे। सरकारी सहायता के तहत करीब 3,600 प्रभावित परिवारों को हर महीने 2,000 रुपये और 16 किलो चावल दिया जा रहा है। हालांकि कई परिवार मानते हैं कि इससे उनकी पूरी भरपाई नहीं हो सकी।

फिर जमीन देने को तैयार हैं कई किसान

75 वर्षीय अंगूर दास ने बताया कि उनके परिवार ने 6 बीघा जमीन परियोजना के लिए दी थी। उनके पति टाटा के सिंगूर छोड़ने के बाद गहरे सदमे में चले गए। वर्ष 2019 में उनका निधन हो गया। उन्होंने कहा कि यदि टाटा समूह दोबारा आता है तो वे अपनी बची हुई जमीन भी देने के लिए तैयार हैं।

रोजगार के सपने फिर जागे

अनिद्य दास की उम्र आंदोलन के समय केवल 12 साल थी। आज वे 32 साल के हैं। रोजगार के लिए उन्हें रोज कोलकाता जाना पड़ता है। उनका कहना है कि यदि उस समय फैक्ट्री शुरू हो जाती तो स्थानीय युवाओं को बाहर नहीं जाना पड़ता। उनके परिवार ने भी जमीन दी थी। लेकिन अब वह जमीन खेती के लायक भी नहीं बची है।

प्रशिक्षण मिला, नौकरी नहीं मिली

खासेरभेड़ी गांव के स्वरूप दास ने भी परियोजना के लिए 2 बीघा जमीन दी थी। उन्होंने बताया कि उनके दोनों भाइयों का चयन मैकेनिकल इंजीनियरिंग प्रशिक्षण के लिए हुआ था।

उत्तराखंड में प्रशिक्षण भी शुरू हो गया था। लेकिन परियोजना बंद होने के बाद नौकरी का सपना अधूरा रह गया। उन्होंने कहा कि यदि टाटा या कोई दूसरी बड़ी कंपनी आती है तो वे फिर जमीन देने के लिए तैयार हैं।

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