छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल बदलाव की चर्चा फिर से गरमा गई है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इंतजार कीजिए कहकर ऐसा तड़का लगाया कि राजधानी से लेकर संगठन तक हर कोई अपनी-अपनी कड़ाही में संभावनाओं की खिचड़ी पकाने लगा। ऊपर से मुख्यमंत्री का दिल्ली दौरा हो गया, तो लोगों ने संभावित तारीख तक निकालनी शुरू कर दी। हालांकि अभी सरकार सुशासन तिहार में व्यस्त है, इसलिए माना जा रहा है कि 10 जून के बाद ही कोई बड़ा पकवान परोसा जाएगा। चर्चा तो यहां तक है कि सभी मंत्रियों से इस्तीफे तक ले लिए गए हैं। लेकिन असली चिंता उन 4-5 मंत्रियों की है जिनके प्रदर्शन पर संगठन की नजर टेढ़ी बताई जा रही है। बीजेपी में समीक्षा बैठकों का सिलसिला नया नहीं है, लेकिन इस बार सत्ता और संगठन दोनों तरफ जो फुसफुसाहट है, उससे लगता है कि खिचड़ी तो पक रही है, बस इंतजार परोसे जाने का है।
विजय शर्मा के दोनों हाथ में लड्डू
मंत्रिमंडल बदलाव की चर्चा में सबसे ज्यादा नाम उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का चल रहा है। कहा जा रहा है कि उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। समर्थकों का तर्क है कि वे दिल्ली जाकर मंत्री से ऊपर की भूमिका में दिखाई देंगे और मौका मिलते ही फिर सत्ता में वापसी भी कर सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि भला मंत्री पद का मोह इतनी आसानी से कौन छोड़ता है, लेकिन राजनीति में समीकरण मोह से ज्यादा ताकतवर होते हैं। विजय शर्मा लगातार संगठन में अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष नितिन नबीन से उनके अच्छे संबंध बताए जाते हैं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से भी सीधा संवाद है। ऐसे में उनके समर्थक यही कह रहे हैं कि चाहे सरकार में रहें या संगठन में जाएं, विजय शर्मा के दोनों हाथ में लड्डू ही रहने वाले हैं।
बस्तर का खाना और राजनीति का जायका
खाने-पीने की चर्चा राजनीति में भी स्वाद बढ़ा देती है। पिछले दिनों बस्तर दौरे पर आए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर के खानपान की जमकर तारीफ की। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पूरे देश में ऐसा खाना नहीं मिलता। लेकिन राजनीतिक गलियारों में ज्यादा चर्चा उस लाइन की हुई जिसमें उन्होंने विजय शर्मा की तरफ इशारा करते हुए कहा कि विजय ने एक-एक व्यंजन समझा-समझाकर खिलाया। अब राजनीति में समझदार लोग समझ गए कि तारीफ सिर्फ खाने की नहीं, खिलाने वाले की भी थी। बस फिर क्या था, जो लोग विजय शर्मा के संगठन रवाना होने की मिठाई बांटने का इंतजार कर रहे थे, उनका जायका थोड़ा बिगड़ गया।
बाबा युवा हो गए, बैज बेचैन हो गए
उधर छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस में भी कुर्सी की राजनीति ने रफ्तार पकड़ ली है। पूर्व उपमुख्यमंत्री टी एस सिंहदेव ने अचानक प्रदेश दौरा शुरू किया तो उनके समर्थकों ने हवा बना दी कि हाईकमान उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने जा रहा है। बस इतना सुनना था कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज भी एक्टिव मोड में आ गए। उन्होंने मीडिया में बयान दे दिया कि बाबा साहब वरिष्ठ हैं, उन्हें दिल्ली की राजनीति करनी चाहिए, प्रदेश में युवाओं को मौका मिलना चाहिए। जवाब में बाबा साहब ने भी कह दिया कि वे अभी युवा ऊर्जा से भरे हुए हैं। अब कांग्रेस में युवा कौन है और वरिष्ठ कौन, यह तो हाईकमान जाने, लेकिन इतना तय है कि पिछली बार ढाई-ढाई साल वाला मुख्यमंत्री फार्मूला फेल हुआ था, इस बार चुनाव के ढाई साल पहले अध्यक्ष की कुर्सी पर ही अड़ंगेबाजी शुरू हो गई है।
कमिश्नरी की घंटी और एसपी की धड़कन
रायपुर के बाद अब दुर्ग और बिलासपुर में भी पुलिस कमिश्नरी लागू होने की चर्चा तेज हो गई है। गृह मंत्री विजय शर्मा ने खुद इन चर्चाओं को हवा देते हुए कहा कि रायपुर में व्यवस्था अच्छे से काम कर रही है, इसलिए दूसरे बड़े शहरों में भी इसे लागू किया जा सकता है। अब जैसे ही कमिश्नरी की घंटी बजी, वैसे ही कई आईपीएस अफसरों की धड़कन बढ़ गई। दुर्ग के एसपी विजय अग्रवाल और बिलासपुर के एसपी रजनेश सिंह समेत आधा दर्जन एसपी के बदलाव की चर्चा पहले से चल रही है। खासकर दुर्ग एसपी को लेकर सत्ता और संगठन दोनों तरफ से नेगेटिव रिपोर्ट बताई जा रही है। हत्या, चाकूबाजी और लॉ एंड ऑर्डर के मुद्दों ने स्थानीय नेताओं की नाराजगी बढ़ा दी है। ऐसे में चर्चा है कि जून के दूसरे सप्ताह तक कुर्सी बदल सकती है। कमिश्नरी लागू हुई तो फिर बदलाव थोक के भाव में देखने को मिल सकते हैं।
