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मगरमच्छ संरक्षण से बदली कोटमीसोनार की तस्वीर
मगरमच्छ संरक्षण से बदली कोटमीसोनार की तस्वीर
रायपुर

मगरमच्छ संरक्षण से बदली कोटमीसोनार की तस्वीर

पर्यटन और रोजगार को मिला नया आयाम

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 20 Mar 2026, 04:07 PM · अपडेट: 31 Oct 2026, 07:14 PM
रायपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिले का कोटमीसोनार गांव आज मगरमच्छ संरक्षण के जरिए विकास की नई पहचान बन चुका है। यहां स्थापित मगरमच्छ संरक्षण आरक्षिती केन्द्र न केवल वन्यजीवों के संरक्षण का मजबूत उदाहरण है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यटन को भी नई दिशा दे रहा है।

वन्यजीव संरक्षण का सशक्त मॉडल

मगरमच्छ संरक्षण और पुनर्वास का उद्देश्य केवल वन्यजीवों की रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल है। हालांकि सभी मगरमच्छ प्रजातियां लुप्तप्राय नहीं हैं, लेकिन कुछ प्रजातियों की घटती संख्या को देखते हुए उनके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास जरूरी हो गए हैं। भारत में मगरमच्छ संरक्षण परियोजना की शुरुआत वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत की गई थी। इसका उद्देश्य प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा, कैप्टिव ब्रीडिंग के माध्यम से संख्या वृद्धि और नवजात मगरमच्छों की जीवित रहने की दर को बढ़ाना है।

2006 से शुरू हुई विकास की यात्रा

कोटमीसोनार स्थित मुड़ातालाब को मगरमच्छ संरक्षण के लिए चिन्हित कर यहां विभिन्न जलाशयों से मगरमच्छ लाकर सुरक्षित वातावरण में छोड़ा गया। वर्तमान में इस केन्द्र में लगभग 250 मगरमच्छ संरक्षित हैं। इस परियोजना की नींव 9 मई 2006 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा रखी गई, जबकि 23 अगस्त 2008 को तत्कालीन वन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने इसका लोकार्पण किया। करीब 57.037 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस केन्द्र में 34 हेक्टेयर कोर जोन और 23.037 हेक्टेयर बफर जोन विकसित किया गया है।

पर्यटन सुविधाओं से बढ़ा आकर्षण

वन विभाग ने इस केन्द्र को पर्यटन की दृष्टि से भी विकसित किया है। यहां आने वाले पर्यटकों के लिए पैगोडा, वॉच टावर, इंटरप्रिटेशन सेंटर, कैफेटेरिया, चिल्ड्रन पार्क, ऊर्जा पार्क और 3-डी मिनी थिएटर जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। 1 नवम्बर 2015 से यहां पर्यटन शुल्क लागू किया गया, जिसके बाद पर्यटकों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

रोजगार और स्थानीय विकास को बढ़ावा

पर्यटकों की बढ़ती आवाजाही के कारण कोटमीसोनार गांव अब एक छोटे बाजार के रूप में विकसित हो रहा है। स्थानीय ग्रामीणों को दुकानों, गाइड सेवाओं और अन्य गतिविधियों के माध्यम से रोजगार के अवसर मिल रहे हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।

आसान पहुंच, बढ़ती लोकप्रियता

कोटमीसोनार मगरमच्छ संरक्षण केन्द्र तक पहुंचना भी बेहद आसान है। यह जांजगीर जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर और बिलासपुर से जयरामनगर होते हुए करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन जांजगीर-नैला (30 किमी), कोटमीसोनार (1 किमी), अकलतरा (9 किमी) और बिलासपुर (30 किमी) हैं।

संरक्षण से समृद्धि की मिसाल

कोटमीसोनार का मगरमच्छ संरक्षण केन्द्र आज यह साबित कर रहा है कि यदि योजनाबद्ध तरीके से वन्यजीव संरक्षण किया जाए, तो यह न केवल पर्यावरण के लिए लाभकारी होता है, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव ला सकता है। यह मॉडल छत्तीसगढ़ में संरक्षण और विकास के संतुलन की एक प्रेरणादायक कहानी बनकर उभर रहा है।

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