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भारतीय वायुसेना जगुआर विमान
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बड़ी खबर : भारतीय वायुसेना आखिर क्यों खरीद रही है ब्रिटेन से कबाड़ हो चुके जगुआर विमान? जानिए इसके पीछे का मास्टरप्लान

भारतीय वायुसेना (IAF) ब्रिटेन से 9 पुराने SEPECAT Jaguar लड़ाकू विमान खरीदने जा रही है, लेकिन इनका इस्तेमाल उड़ान भरने के लिए नहीं किया जाएगा। इन विमानों को मुख्य रूप से स्पेयर पार्ट्स के स्रोत के रूप में खरीदा जा रहा है ताकि भारतीय वायुसेना के मौजूदा Jaguar बेड़े को लंबे समय तक ऑपरेशनल रखा जा सके।

कीर्तिमान न्यूज
21 Jun 2026, 12:58 PM
नई दिल्ली

भारतीय रक्षा क्षेत्र से एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। भारतीय वायुसेना (IAF) यूनाइटेड किंगडम (UK) से 9 ऐसे जगुआर लड़ाकू विमान खरीदने जा रही है, जो कभी परमाणु बम गिराने की क्षमता के लिए जाने जाते थे। अब सवाल उठता है कि जब भारतीय वायुसेना पहले से ही फाइटर जेट्स की कमी से जूझ रही है, तो महज 9 पुराने विमानों से स्क्वाड्रन की संख्या कैसे पूरी होगी?

जवाब है—ये विमान वायुसेना की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि एक बेहद खास रणनीतिक मकसद और गुप्त मिशन के लिए खरीदे जा रहे हैं। ब्रिटेन, जो नई दिल्ली का एक मजबूत रक्षा साझेदार है, अचानक भारत के लिए फाइटर जेट्स का सोर्स बनकर उभरा है, लेकिन इस पूरी डील के पीछे एक गहरा पेंच है।

यूरोफाइटर टायफून को छोड़ जगुआर पर दांव क्यों?

इस खबर के बाद रक्षा विशेषज्ञों के बीच सबसे पहला सवाल यही घूम रहा है कि जब यूरोप के पास आधुनिक 'यूरोफाइटर टायफून' (Eurofighter Typhoon) जैसा घातक विमान मौजूद है, तो भारत इन पुराने पड़ चुके जगुआर विमानों में दिलचस्पी क्यों दिखा रहा है?

एक दिलचस्प फ्लैशबैक: एक समय था जब ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और स्पेन ने मिलकर भारत को राफेल के मुकाबले 'यूरोफाइटर टायफून' बेचने की पूरी कोशिश की थी। यहाँ तक कि तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने खुद भारत को मनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। लेकिन भारत ने रणनीतिक सूझबूझ दिखाते हुए फ्रांस के राफेल (Rafale) को चुना।

इसी साल मार्च 2026 में, भारत के रक्षा मंत्रालय ने दुनिया के दो सबसे बड़े 'सिक्स्थ जनरेशन' (छठी पीढ़ी) फाइटर जेट प्रोग्राम्स में रुचि दिखाई थी:

  1. GCAP (ग्लोबल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम): इसमें यूके, इटली और जापान शामिल हैं।

  2. FCAS (फ्यूचर कॉम्बैट एयर सिस्टम): इसमें फ्रांस, जर्मनी और स्पेन थे। (हालांकि, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और बौद्धिक संपदा विवाद के बाद फ्रांस के अलग होने से यह ग्रुप लगभग बिखर चुका है।)

इन आधुनिक तकनीकों के बीच, भारत का वापस जगुआर की तरफ देखना कई सवाल खड़े करता है। आइए इसके असली कारण को समझते हैं।

क्यों जरूरी हैं ये पुराने जगुआर? जानिए असली वजह

सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि ये साधारण विमान नहीं हैं। SEPECAT जगुआर मूल रूप से एक ऐसा फाइटर-बॉम्बर है जो दुश्मन की रडार से बचकर समुद्र की सतह के बिल्कुल करीब और बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान भरने में माहिर है। इसे यूके और फ्रांस ने मिलकर तैयार किया था।

  • भारत और जगुआर का इतिहास: भारत ने 1978 में इसे अपने 'डीप पेनेट्रेशन स्ट्राइक एयरक्राफ्ट' (DPSA) के तौर पर चुना था। इसके बाद भारत को ब्रिटिश एयरफोर्स से 18 और ब्रिटिश एयरोस्पेस से 40 तैयार विमान मिले। बाद में भारत की हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को इसे देश में ही बनाने का लाइसेंस मिला।

  • इकलौता ऑपरेटर: आज भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो अभी भी जगुआर विमानों के करीब 6 स्क्वाड्रन (लगभग 120 विमान) का संचालन कर रहा है।

असली खेल स्पेयर पार्ट्स का है: चूंकि ब्रिटेन, फ्रांस और खुद HAL ने इन विमानों और इनके कलपुर्जों का उत्पादन सालों पहले बंद कर दिया है, इसलिए भारत के पास अपने मौजूदा बेड़े को जिंदा रखने का कोई रास्ता नहीं बचा था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत इन 9 विमानों के साथ 150 से अधिक प्रकार के स्पेयर पार्ट्स और कंपोनेंट्स आयात कर रहा है। इन विमानों को उड़ाया नहीं जाएगा, बल्कि इनके पार्ट्स (जैसे लैंडिंग गियर, हाइड्रोलिक्स, एवियोनिक्स और रोल्स-रॉयस एडोर इंजन) निकालकर भारतीय वायुसेना के मौजूदा जगुआर विमानों में लगाए जाएंगे।

क्या भारत पहुंच चुके हैं ये फाइटर जेट?

इंटरनेट पर लीक हुई कुछ तस्वीरों में ब्रिटिश बंदरगाह पर सफेद सुरक्षा कवच (कवर) में लिपटे हुए कुछ जेट्स देखे गए हैं। रक्षा मामलों के ओपन-सोर्स ट्रैकर्स का दावा है कि ये विमान भारत के लिए रवाना हो चुके हैं। हालांकि, हमेशा की तरह भारतीय वायुसेना या रक्षा मंत्रालय ने इस संवेदनशील डील पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है।

यह पहली बार नहीं है जब भारत ऐसा कर रहा है। इससे पहले भी भारतीय वायुसेना फ्रांस (रिटायर्ड 2005), यूके (रिटायर्ड 2007) और ओमान (रिटायर्ड 2014) से उनके पुराने जगुआर विमान और कलपुर्जे खरीद चुकी है, ताकि अपने बेड़े को सर्विस में बनाए रख सके।

आधुनिक युद्ध में आज भी क्यों 'किंग' है जगुआर?

आज के दौर में जब लंबी दूरी की एयर डिफेंस मिसाइलें (SAM) आसमान में बहुत ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों को पलक झपकते ही नष्ट कर सकती हैं, तब युद्ध की पुरानी रणनीति फिर से जिंदा हो गई है। दुश्मन के रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम से बचने के लिए विमानों का जमीन या समुद्र के करीब (लो-एल्टीट्यूड) उड़ना जरूरी हो गया है।

भारतीय वायुसेना ने इन पुराने विमानों को 'मीडियम-एल्टीट्यूड स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक' के लिए अपग्रेड किया है। यही वजह है कि भारत अपनी इस ताकत को खोना नहीं चाहता और जब तक नए स्वदेशी फाइटर जेट्स तैयार नहीं हो जाते, तब तक इन 'बूढ़े शेरों' को विदेशी कलपुर्जों के सहारे ही सही, लेकिन पूरी तरह चुस्त-दुरुस्त रखना भारत की मजबूरी भी है और एक बेहतरीन रणनीति भी।

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