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बस्तर की कला को ग्लोबल पहचान, ई-कॉमर्स से जुड़ेंगे शिल्पकार
बस्तर की कला को ग्लोबल पहचान, ई-कॉमर्स से जुड़ेंगे शिल्पकार
बस्तर संभाग

बस्तर कला : दुनिया के बाजार में, 1.80 करोड़ की परियोजना , शिल्पकारों को मिलेगा नया मंच

बस्तर के पारंपरिक हस्तशिल्प को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने के लिए राज्य शासन ने 1.80 करोड़ रुपए की विशेष परियोजना को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत ढोकरा शिल्प, काष्ठ कला, टेराकोटा, सीसल शिल्प और अन्य पारंपरिक उत्पाद पहली बार अमेजन, फ्लिपकार्ट और मीशो जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगे।

प्रकाशित: 14 Jun 2026, 03:36 PM · अपडेट: 25 Jun 2026, 09:01 AM
जगदलपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
कभी नक्सल हिंसा और सुरक्षा चुनौतियों के कारण सुर्खियों में रहने वाला बस्तर अब अपनी पहचान बदल रहा है। आज बस्तर विकास, संस्कृति और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है। घने जंगलों, झरनों और समृद्ध आदिवासी परंपराओं से सजा यह क्षेत्र अब अपनी अनूठी कला और हस्तशिल्प के जरिए देश-दुनिया के बाजारों तक पहुंचने की तैयारी कर रहा है। राज्य शासन ने बस्तर के पारंपरिक हस्तशिल्प को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने के लिए 1 करोड़ 80 लाख रुपए की परियोजना को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत पहली बार बस्तर के शिल्प उत्पाद अमेजन, फ्लिपकार्ट और मीशो जैसे बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगे। इससे स्थानीय कलाकारों को नए बाजार मिलेंगे और उनकी आय में वृद्धि होगी।

बस्तर की कला को नई पहचान 

बस्तर अपनी अनूठी ढोकरा कला, काष्ठ शिल्प, टेराकोटा, सीसल शिल्प, तुम्बा कला और पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा के लिए देशभर में जाना जाता है। इन कलाओं में केवल उत्पाद नहीं बनते, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति, परंपरा और आदिवासी जीवन की झलक दिखाई देती है। अब तक इन उत्पादों की बिक्री मुख्य रूप से स्थानीय हाट-बाजारों, मेलों और प्रदर्शनियों तक सीमित रहती थी। शिल्पकारों को अपनी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता था। कई बार तैयार उत्पाद महीनों तक बिकने का इंतजार करते रहते थे। नई परियोजना के लागू होने के बाद बस्तर के कलाकारों के लिए बाजार की सीमाएं खत्म हो जाएंगी। अब देश के किसी भी कोने में बैठा ग्राहक बस्तर की कला को ऑनलाइन खरीद सकेगा।

डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ेंगे शिल्पकार

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान संकुल स्तरीय संगठन और कलागुड़ी के माध्यम से संचालित होने वाली इस परियोजना का उद्देश्य केवल हस्तशिल्प उत्पादों की बिक्री बढ़ाना नहीं है, बल्कि शिल्पकारों को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ना भी है। परियोजना के तहत कलाकारों को ऑनलाइन बिक्री, उत्पाद प्रस्तुति, डिजिटल भुगतान और ग्राहक प्रबंधन जैसी आधुनिक व्यवस्थाओं से परिचित कराया जाएगा। इससे वे सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंच सकेंगे और बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी।

चरणबद्ध तरीके से काम

परियोजना के लिए स्वीकृत 1.80 करोड़ रुपए की राशि अगले तीन वर्षों में चरणबद्ध तरीके से खर्च की जाएगी। इसमें लगभग 80 प्रतिशत राशि रोटेशनल फंड के रूप में उपयोग की जाएगी। इस व्यवस्था के तहत शिल्पकारों द्वारा तैयार उत्पादों की सीधी खरीद कर स्टॉक तैयार किया जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि कलाकारों को अपने उत्पाद बिकने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। उन्हें समय पर भुगतान मिलेगा और आर्थिक स्थिरता भी सुनिश्चित होगी। यह मॉडल शिल्पकारों के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा।

एक हजार शिल्पकारों को लाभ

इस महत्वाकांक्षी योजना से बस्तर क्षेत्र के करीब एक हजार शिल्पकारों और लगभग 250 परिवारों को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। पहले चरण में 250 से 300 शिल्पकारों का चयन किया जाएगा। चयनित कलाकारों को 60 से 90 दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। प्रशिक्षण में आधुनिक डिजाइन, उत्पाद गुणवत्ता सुधार, आकर्षक पैकेजिंग, ब्रांडिंग और ऑनलाइन मार्केटिंग की जानकारी दी जाएगी ताकि बस्तर के उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग के अनुरूप तैयार किए जा सकें।

ढोकरा कला में बसती है बस्तर की आत्मा

बस्तर की पहचान उसकी ढोकरा कला से भी जुड़ी हुई है। धातु से तैयार होने वाली यह कला विश्वभर में अपनी विशिष्ट शैली के लिए जानी जाती है। इसी तरह लकड़ी की नक्काशी, टेराकोटा शिल्प और प्राकृतिक संसाधनों से तैयार होने वाले उत्पाद आदिवासी संस्कृति की जीवंत तस्वीर पेश करते हैं। इन कलाकृतियों में केवल शिल्प नहीं, बल्कि पीढ़ियों का अनुभव, परंपराओं की विरासत और जंगलों से जुड़ा जीवन दर्शन दिखाई देता है।

बदल रही है बस्तर की पहचान

एक समय था जब बस्तर का नाम सुनते ही लोगों के मन में नक्सलवाद और संघर्ष की तस्वीर उभरती थी। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और रोजगार के क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों के बीच बस्तर की कला और संस्कृति भी नई पहचान बना रही है। यह परियोजना केवल आर्थिक विकास का माध्यम नहीं है, बल्कि बस्तर की सकारात्मक छवि को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की दिशा में भी बड़ा कदम मानी जा रही है।

आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता बस्तर

बस्तर के कलाकारों के लिए यह योजना उम्मीद की नई किरण लेकर आई है। इससे न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि उनकी कला को भी वह पहचान मिलेगी जिसकी वह लंबे समय से हकदार रही है।नक्सलवाद की छाया से बाहर निकलता बस्तर अब कला, संस्कृति और उद्यमिता के सहारे नई उड़ान भरने को तैयार है। आने वाले वर्षों में बस्तर के हस्तशिल्प उत्पाद केवल स्थानीय मेलों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि दुनिया भर के घरों और बाजारों तक पहुंचकर इस क्षेत्र की नई पहचान बनेंगे।
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