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चाबहार पोर्ट
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भारत को बड़ा झटका : ईरान के चाबहार पोर्ट पर हमलों के बाद रणनीतिक समीकरण बदले

ईरान के चाबहार पोर्ट पर अमेरिकी हमलों के बाद भारत की रणनीतिक चिंताएं बढ़ गई हैं। भारत ने इस बंदरगाह के विकास में बड़ा निवेश किया था, जिसका उद्देश्य मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच बनाना था। बढ़ते तनाव के बीच इस महत्वाकांक्षी परियोजना के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।

कीर्तिमान न्यूज
09 Jul 2026, 02:16 PM
तेहरान
पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ युद्धविराम (सीजफायर) खत्म करने के एलान के बाद दोनों देशों के बीच जंग तेज हो गई है। इसी कड़ी में अमेरिकी वायुसेना ने गुरुवार को लगातार दूसरे दिन ईरान के कई ठिकानों पर भीषण हवाई हमले किए। 
इस बार अमेरिका के निशाने पर ईरान का रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'चाबहार पोर्ट' भी रहा, जहां अमेरिकी बमों ने भारी तबाही मचाई है। चाबहार पोर्ट पर हुआ यह हमला सीधे तौर पर भारत के हितों पर एक बड़ा आघात माना जा रहा है। दरअसल, इस बंदरगाह का एक बड़ा हिस्सा भारत के सहयोग और अरबों रुपये के निवेश से तैयार हुआ है। 

महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट पर सवालिया निशान 

रक्षा और विदेश मामलों के जानकारों का कहना है कि चाबहार पर हुए इस हमले ने भारत के उस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के भविष्य पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है, जिसके जरिए नई दिल्ली मध्य एशिया में अपनी मजबूत पकड़ बनाना चाहती थी। हालांकि, राहत की बात बस इतनी है कि फिलहाल इस पोर्ट पर भारत की सीधी और सक्रिय मौजूदगी नहीं थी। 

अमेरिकी हमलों ने पलट बाजी 

भौगोलिक दृष्टि से चाबहार पोर्ट ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में मकरान तट पर स्थित है। इसकी सबसे खास बात यह है कि यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जिसे चीन विकसित कर रहा है) से महज 170 किलोमीटर की दूरी पर है। भारत ने इस पोर्ट में निवेश इसी रणनीति के तहत किया था ताकि पाकिस्तान पर निर्भर रहे बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया के देशों तक सीधी पहुंच बनाई जा सके। कुछ समय पहले जब ईरान और अमेरिका के बीच शांति समझौते की सुगबुगाहट हुई थी, तब भारत को उम्मीद जगी थी कि चाबहार में दोबारा तेजी से काम शुरू हो सकेगा। लेकिन ताजा अमेरिकी हमलों ने एक झटके में पूरी बिसात को पलट कर रख दिया है। 

चाबहार पोर्ट पर हमला
हिस्सेदारी ईरानी कंपनी को सौंपी

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका द्वारा ईरान पर लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के चलते भारत ने कुछ समय पहले एक सोची-समझी रणनीति अपनाई थी। भारत ने चाबहार फ्री जोन में अपनी हिस्सेदारी को अस्थायी रूप से एक स्थानीय ईरानी कंपनी को सौंप दिया था। वर्तमान में भारत वहां सीधे तौर पर ऑपरेशंस को हैंडल नहीं कर रहा है। इस कदम के पीछे भारत का मकसद अपने 120 मिलियन डॉलर (लगभग 10 अरब रुपये से अधिक) के भारी-भरकम निवेश को अमेरिकी प्रतिबंधों की आंच से बचाना था, ताकि स्थितियां सामान्य होने पर वहां दोबारा वापसी की जा सके। 

पॉलिसी पर हमले का असर 

भले ही गुरुवार को हुए हमलों से भारत के किसी चालू या एक्टिव इन्फ्रास्ट्रक्चर को तुरंत नुकसान न पहुंचा हो, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारत इस संकट से अछूता है। यह हमला असल में भारत की उस 'वेस्ट एशिया पॉलिसी' की बुनियाद पर चोट है, जिसे भारत की जियोपॉलिटिकल ताकत का अहम हिस्सा माना जाता रहा है। भारत पिछले करीब दो दशकों से चाबहार पोर्ट को अपनी विदेश नीति के केंद्र में रखे हुए था। इसे न केवल एक व्यापारिक मार्ग, बल्कि 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' (INSTC) की एक सबसे मजबूत कड़ी के तौर पर देखा जा रहा था। 

भारत को तलाशना पड़ेगा वैकल्पिक रास्ते 

प्रोजेक्ट को लेकर भारत की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि साल 2024 में ही भारत ने चाबहार के 'शहीद बेहेश्ती टर्मिनल' को अगले 10 साल तक चलाने के लिए ईरान सरकार के साथ एक दीर्घकालिक समझौता किया था। मगर वाशिंगटन के कड़े रुख और नई पाबंदियों ने भारत के लिए जमीन पर काम करना बेहद पेचीदा बना दिया, जिसके बाद भारत को बैकफुट पर आकर वैकल्पिक रास्ते तलाशने पड़े। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के इस कदम से भारत को कोई तुरंत ऑपरेशनल घाटा भले न दिख रहा हो, लेकिन रणनीतिक तौर पर यह बहुत बड़ा नुकसान है। 

प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में 

चाबहार के आसपास का इलाका अब अनिश्चितकाल के लिए एक युद्ध क्षेत्र और भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में फंस गया है। इस पूरी स्थिति का एक दूसरा पहलू यह भी है कि चाबहार पर मंडराते संकट के बादल पाकिस्तान के लिए एक बड़ी राहत बनकर आ सकते हैं। चाबहार पोर्ट अगर पूरी क्षमता से शुरू हो जाता, तो इससे पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट की अहमियत काफी कम हो जाती। साथ ही, इस पूरे क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान के दबदबे को भारत की तरफ से सीधी चुनौती मिलती। लेकिन अब अमेरिकी प्रतिबंधों और सीधे हवाई हमलों ने भारत के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में धकेलने का काम कर दिया है।
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