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नैनोप्लास्टिक कण मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) की गतिविधियों में अधिक बदलाव
नैनोप्लास्टिक कण मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) की गतिविधियों में अधिक बदलाव
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 ब्रेन हेल्थ : अध्ययन में सामने आए चिंताजनक नतीजे,नैनोप्लास्टिक

एक नई वैज्ञानिक रिसर्च में पाया गया है कि छोटे आकार के नैनोप्लास्टिक कण मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरॉन्स) की गतिविधियों में अधिक बदलाव पैदा कर सकते हैं। अध्ययन के अनुसार ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण मस्तिष्क की कोशिकाओं के भीतर प्रवेश कर उनकी संरचना और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि नैनोप्लास्टिक का बढ़ता संपर्क भविष्य में न्यूरोलॉजिकल समस्याओं और मस्तिष्क संबंधी बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। इस शोध ने प्लास्टिक प्रदूषण को केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने रखा है।

कीर्तिमान नेटवर्क
01 Jun 2026, 05:13 PM
रायपुर
प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर दुनिया भर में बढ़ती चिंताओं के बीच एक नई वैज्ञानिक रिसर्च ने मानव स्वास्थ्य, खासकर मस्तिष्क पर इसके संभावित प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि बेहद छोटे आकार के नैनोप्लास्टिक कण  मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं यानी न्यूरॉन्स की गतिविधियों में अपेक्षाकृत अधिक बदलाव ला सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण न केवल मस्तिष्क की कोशिकाओं के भीतर प्रवेश कर सकते हैं, बल्कि वहां जमा होकर उनकी संरचना और कार्यप्रणाली को भी प्रभावित कर सकते हैं।

 नैनोप्लास्टिक

नैनोप्लास्टिक प्लास्टिक के बेहद छोटे कण होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रोमीटर (1000 नैनोमीटर) से भी कम होता है। ये प्लास्टिक कचरे के टूटने, कॉस्मेटिक उत्पादों, सिंथेटिक कपड़ों और कई औद्योगिक प्रक्रियाओं के जरिए पर्यावरण में पहुंचते हैं।  ये कण हवा, पानी और भोजन के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

न्यूरॉन्स के भीतर प्लास्टिक कण

शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में विभिन्न आकार के पॉलीस्टाइरीन नैनोप्लास्टिक कणों का मस्तिष्क की कोशिकाओं पर प्रभाव जांचा गया। अध्ययन में पाया गया कि ये कण न्यूरॉन्स के भीतर प्रवेश कर जमा हो सकते हैं। शोध के दौरान यह भी देखा गया कि छोटे आकार के नैनोप्लास्टिक कणों का प्रभाव बड़े कणों की तुलना में अधिक स्पष्ट था। शोधकर्ताओं के अनुसार, कणों के आकार में कमी आने के साथ न्यूरॉन्स में संरचनात्मक और जीन अभिव्यक्ति से जुड़े बदलाव अधिक दिखाई दिए। हालांकि ये बदलाव अभी अपेक्षाकृत सूक्ष्म स्तर पर देखे गए हैं, लेकिन वैज्ञानिक इसे भविष्य के लिए चेतावनी मान रहे हैं।

मस्तिष्क तक कैसे पहुंचते हैं

नैनोप्लास्टिक इतने छोटे होते हैं कि वे शरीर की कई जैविक बाधाओं को पार कर सकते हैं। कुछ अध्ययनों के अनुसार ये रक्त-मस्तिष्क अवरोध को भी पार कर सकते हैं, जो सामान्यतः दिमाग को हानिकारक तत्वों से बचाने का काम करता है। एक बार मस्तिष्क तक पहुंचने के बाद ये कोशिकाओं के भीतर जमा होकर न्यूरोलॉजिकल प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकते हैं। 

भोजन और पानी के माध्यम से

प्लास्टिक की बोतलों, पैकेज्ड फूड, समुद्री भोजन, नमक और पीने के पानी में मौजूद सूक्ष्म प्लास्टिक कण शरीर में पहुंच सकते हैं। भोजन के साथ ये पाचन तंत्र में प्रवेश करते हैं और फिर रक्त प्रवाह तक पहुंच सकते हैं।

सांस के जरिए

हवा में मौजूद प्लास्टिक के सूक्ष्म कण सांस के साथ फेफड़ों में चले जाते हैं। वहां से कुछ कण रक्त परिसंचरण तंत्र में प्रवेश कर शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंच सकते हैं।

रक्त-मस्तिष्क अवरोध को पार करके

सामान्यतः हमारा मस्तिष्क एक सुरक्षा परत, जिसे ब्लड-ब्रेन बैरियर कहा जाता है, से सुरक्षित रहता है। लेकिन नैनोप्लास्टिक इतने छोटे होते हैं कि कुछ परिस्थितियों में इस सुरक्षा परत को पार कर मस्तिष्क की कोशिकाओं तक पहुंच सकते हैं। शोध में पाया गया है कि ये न्यूरॉन्स के अंदर जमा होकर उनकी गतिविधियों और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि मस्तिष्क में जमा होने वाले नैनोप्लास्टिक ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, सूजन और कोशिकीय क्षति को बढ़ा सकते हैं। हालांकि अभी इस पर और शोध जारी है, लेकिन शुरुआती अध्ययन संकेत देते हैं कि लंबे समय में यह मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

न्यूरोलॉजिकल बीमारियाँ और बचाओ 

नैनोप्लास्टिक के कारण होने वाला ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, न्यूरोइन्फ्लेमेशन और कोशिकीय क्षति भविष्य में अल्जाइमर, पार्किंसन और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम से जुड़ सकता है। हालांकि अभी तक यह पूरी तरह साबित नहीं हुआ है कि नैनोप्लास्टिक सीधे इन बीमारियों का कारण बनते हैं, लेकिन कई शोध इनके संभावित संबंधों की ओर संकेत कर रहे हैं। बचाओ के तरीके :- 
  • प्लास्टिक की बोतलों की जगह स्टील या कांच की बोतलों का उपयोग करें।
  • गर्म भोजन को प्लास्टिक कंटेनरों में रखने से बचें।
  • पैकेज्ड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का कम सेवन करें।
  • फिल्टर किया हुआ स्वच्छ पानी पिएं।
  • सिंगल-यूज प्लास्टिक (प्लास्टिक बैग, स्ट्रॉ आदि) का उपयोग कम करें।
  • घर में नियमित सफाई रखें ताकि धूल में मौजूद प्लास्टिक कण कम हों।
  • सिंथेटिक कपड़ों की बजाय प्राकृतिक कपड़ों को प्राथमिकता दें।
  • फल, सब्जियां और एंटीऑक्सीडेंट युक्त संतुलित आहार लें।

शोध

केवल प्लास्टिक कणों की मात्रा ही नहीं बल्कि उनका आकार भी बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे कणों का आकार छोटा होता गया, न्यूरॉन्स पर उनके प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई दिए। शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में अधिक जटिल मॉडल और लंबे समय तक होने वाले प्रभावों पर अध्ययन की आवश्यकता है, ताकि वास्तविक परिस्थितियों में इनके असर को बेहतर तरीके से समझा जा सके।

वैश्विक चिंता

हाल के वर्षों में कई अध्ययनों में मानव शरीर के विभिन्न अंगों, यहां तक कि मस्तिष्क के ऊतकों में भी माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इससे वैज्ञानिक समुदाय में चिंता बढ़ी है कि प्लास्टिक प्रदूषण केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि एक संभावित सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट भी बन सकता है।
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