CG Transport Department: सड़कों पर दौड़ रही यात्री बसों की हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए GPS लगाना अनिवार्य किया गया था, ताकि किसी भी वक्त उनकी लाइव लोकेशन ट्रैक की जा सके। लेकिन छत्तीसगढ़ में बस संचालकों ने इस पूरी व्यवस्था को ठेंगा दिखाने का एक अनोखा तरीका ढूंढ निकाला है। परिवहन विभाग की हालिया समीक्षा बैठक में जो चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, उसने विभाग की नींद उड़ा दी है। जांच में खुलासा हुआ कि राज्य भर में 2,000 से भी अधिक बसें ऐसी हैं, जिनमें GPS डिवाइस तो लगी हुई हैं, लेकिन उन्हें चालू ही नहीं रखा गया।
3700 बसों में से 300 बसें में ही GPS सिस्टम
डिवाइस बंद होने की वजह से निर्भया कमांड सेंटर के कंट्रोल रूम को इन बसों की कोई लाइव लोकेशन नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा, राज्य में दौड़ रही लगभग 3,700 यात्री बसों में से करीब 300 बसें तो ऐसी पाई गईं, जिनमें आज तक GPS लगाया ही नहीं गया। हैरानी की बात यह भी है कि सरकार और परिवहन विभाग के लगातार कड़े निर्देशों के बावजूद बस संचालक इस नियम को अनदेखा कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, स्कूल बसों पर इस तरह की कड़ाई फिलहाल देखने को नहीं मिल रही है। इस लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए परिवहन विभाग ने कड़ा रुख अपनाया है।
सिस्टम से बचने की कोशिश क्यों
विभाग ने स्पष्ट किया है कि जिन बसों में GPS नहीं लगा है या जिसे जानबूझकर बंद रखा जा रहा है, उनके परमिट निरस्त कर दिए जाएंगे। दोषी बस संचालकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर बस संचालक इस सिस्टम से बचने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? दरअसल, GPS चालू रहने पर बस की लाइव लोकेशन के साथ-साथ महीने भर का पूरा रिकॉर्ड निकल आता है। इससे यह साफ पता चल जाता है कि बस किस समय चली, कहां और कितनी देर रुकी, और क्या वह अपने तय रूट पर चल रही थी या नहीं।
विभाग को आशंका है कि GPS बंद रखने के पीछे कई तरह का घालमेल हो सकता है:
मनमर्जी की टाइमिंग: अधिक सवारियां जुटाने के चक्कर में तय समय से हटकर बसें चलाना।
रूट डायवर्जन: निर्धारित रास्ते के बजाय अपनी सुविधा के हिसाब से दूसरा रूट पकड़ लेना।
ओवरस्पीडिंग: जीपीएस से बस की रफ्तार पर भी नजर रखी जा सकती है, जिससे तेज रफ्तार चलाने की पोल खुल सकती है।
पैनिक बटन लगाना अनिवार्य
यदि सिस्टम चालू रहे तो इन तमाम गड़बड़ियों का पूरा रिकॉर्ड बन जाता है और विभाग बाद में भी कार्रवाई कर सकता है। यही वजह है कि चेकिंग से बचने के लिए डिवाइस को बंद रखा जा रहा था। सर्वोच्च न्यायालय ने सार्वजनिक परिवहन वाहनों में 'व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस' (VLTD) और 'पैनिक बटन' लगाना अनिवार्य किया है। मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के उद्देश्य से यह व्यवस्था लागू की गई है। इसके बावजूद कंट्रोल रूम तक लोकेशन न पहुंचना पूरी सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी तंत्र पर बड़े सवाल खड़े करता है।
समझाइश और कड़े तेवरों के बाद दिखा असर
हाल ही में शुक्रवार को परिवहन विभाग ने बस संचालकों के साथ एक अहम बैठक की। इसमें संचालकों को सख्त चेतावनी देने के साथ-साथ यह भी समझाया गया कि किसी भी सड़क हादसे या आपात स्थिति में GPS उनके खुद के लिए भी कितना मददगार साबित हो सकता है। इस समझाइश और कड़े तेवरों के बाद असर दिखने लगा है। बिना GPS वाली 300 बसों में से 125 बसों के संचालकों ने तुरंत डिवाइस लगाने के लिए आवेदन जमा कर दिए हैं।

