Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में जल-जंगल-जमीन की रक्षा और विस्थापन के मुद्दे को लेकर ग्रामीणों का विरोध तेज होता नजर आ रहा है। कोकड़ी गांव में जल-जंगल-जमीन बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में महापंचायत आयोजित की गई। गरियाबंद और धमतरी जिले के उदंती-सीतानदी अभयारण्य क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 128 गांवों के लोग शामिल हुए। ग्रामीणों ने विस्थापन का विरोध करते हुए अपनी समस्याओं के जल्द निराकरण की मांग किया।
जबरिया विस्थापन और विकास की कमी पर नाराजगी
बिन्द्रानवागढ़ विधायक जनक ध्रुव और सिहावा विधायक अंबिका मरकाम सहित कई निर्वाचित जनप्रतिनिधि और सामाजिक पदाधिकारी मौजूद रहे। सभा के दौरान ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि विस्थापन नीति की समुचित जानकारी दिए बिना उन्हें जबरन विस्थापित करने की कोशिश की जा रही है। लोगों ने स्पष्ट किया कि उनकी सहमति और अधिकारों की अनदेखी कर लिए जाने वाले फैसलों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। अभयारण्य क्षेत्र के गांवों में बुनियादी सुविधाओं और विकास कार्यों की कमी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। ग्रामीणों ने क्षेत्र में अपेक्षित विकास नहीं होने पर नाराजगी जताई। इसके साथ ही शाम के समय आवाजाही पर लगाए गए प्रतिबंधों का विरोध करते हुए लोगों ने अपनी परेशानियों को सामने रखा। लोगों ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समय के भीतर उनकी मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और व्यापक रूपक किया जाएगा।
60 दिनों में समाधान की मांग, संसद और विधानसभा तक पहुंचेगा
ग्रामीणों की समस्याओं और मांगों पर विस्तार से चर्चा की गई। इसके बाद शासन से 60 दिनों के भीतर समस्याओं का समाधान कराने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया। सभा में यह भी निर्णय लिया गया कि पारित प्रस्ताव को संसद, विधानसभा और जिला पंचायत के पटल पर रखकर उस पर कार्रवाई सुनिश्चित किया जाएगा।मांगें पूरी नहीं हुआ तो व्यापक आंदोलन
महापंचायत में शामिल लोगों ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समय के भीतर उनकी मांगों पर उचित कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। ग्रामीणों ने इस मामले को अनुसूचित क्षेत्रों में पेसा (PESA) कानून के प्रावधानों के उल्लंघन से जोड़ते हुए विरोध प्रदर्शन की बात कही। ग्रामीणों ने साफ संदेश दिया कि जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों, विकास की जरूरतों और विस्थापन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर उनकी आवाज को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। अब इस प्रस्ताव पर शासन-प्रशासन की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर गांवों के लोगों की नजर रहेगी।






