Energy News: राजस्थान में बिजली की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए धौलपुर गैस पावर प्लांट से बिजली लेनी पड़ रही है। अक्टूबर में इस प्लांट में बिजली उत्पादन की लागत बढ़कर 46.09 रुपए प्रति यूनिट तक पहुंच गई। यह बेहद ऊंची लागत है। ऐसे में बिजली की आपूर्ति बनाए रखने के साथ-साथ इस खर्च की भरपाई करना भी बड़ी चुनौती बन गया है।
कमजोर मानसून के कारण गर्मी का असर सामान्य से ज्यादा समय तक बना हुआ है। इससे कूलिंग और सिंचाई के लिए बिजली की खपत बढ़ी है। वहीं, कम बारिश से जलविद्युत उत्पादन घटा है। ऐसे में बिजली की मांग पूरी करने के लिए कोयला आधारित संयंत्रों पर दबाव बढ़ गया है। सितंबर में देश में बिजली की कमी करीब एक दशक के सबसे खराब स्तर पर पहुंच गई थी।
बिजली खरीद समझौता नहीं, खर्च की वसूली मुश्किल
राजस्थान ऊर्जा विकास एवं आईटी सर्विसेज लिमिटेड (RUVITL) राज्य की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के लिए बिजली खरीदने का काम करती है। बिजली की मांग बढ़ने और खुले बाजार में पर्याप्त बिजली नहीं मिलने के कारण कंपनी को जरूरत के समय धौलपुर प्लांट का सहारा लेना पड़ रहा है।
कितना बढ़ा कोयले का संकट
- भारत के बिजली संयंत्रों में कोयले का भंडार करीब पांच साल के निचले स्तर पर पहुंच गया है।
- बिजली की बढ़ती मांग और जलविद्युत उत्पादन में कमी के कारण घरेलू कोयले की उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है।
- बिजली मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 17 अक्टूबर तक देश के करीब आधे बिजली संयंत्रों में कोयले का स्टॉक बेहद कम था। इन संयंत्रों के पास उनकी जरूरत के एक-चौथाई से भी कम कोयला बचा था।
12 दिनों में 30 करोड़ रुपए से ज्यादा की बिजली सप्लाई
अक्टूबर के शुरुआती 12 दिनों में धौलपुर गैस पावर प्लांट से 30 करोड़ रुपए से अधिक की बिजली सप्लाई की गई, इस दौरान उत्पादन की लागत 41 से 46 रुपए प्रति यूनिट के बीच रही। प्लांट का संचालन राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RVUNL) करता है। मंजूर टैरिफ वाला बिजली खरीद समझौता नहीं होने के कारण निगम के सामने इस खर्च की वसूली का रास्ता स्पष्ट नहीं है। ऐसे में बिजली उत्पादन की लागत का वित्तीय बोझ उसके लिए चुनौती बना हुआ है।बिजली की मांग और उत्पादन लागत के बीच संतुलन बड़ी चुनौती
राजस्थान के धौलपुर गैस पावर प्लांट में 46.09 रुपये प्रति यूनिट तक पहुंची उत्पादन लागत और देशभर में कोयले के घटते भंडार की स्थिति ऊर्जा क्षेत्र की चुनौतियों को सामने लाती है। एक ओर बिजली की मांग पूरी करना जरूरी है, तो दूसरी ओर महंगे ईंधन और उत्पादन लागत का बोझ भी संभालना है।







