डिजिटल दौर में भी कायम है लिथोग्राफी की पहचान, खैरागढ़ में आज भी जिंदा है पत्थरों की छपाई कला
छत्तीसगढ़ के राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में 230 साल पुरानी लिथोग्राफी कला आज भी जीवित है। यहां विद्यार्थी जर्मनी से लाए गए लाइमस्टोन और ब्रिटिशकालीन प्रेस की मदद से पत्थर पर चित्र बनाकर प्रिंट तैयार करना सीखते हैं। लिथोग्राफी ने कभी अखबार, पोस्टर, कैलेंडर और धार्मिक चित्रों की छपाई में बड़ी भूमिका निभाई थी। यही तकनीक आगे चलकर ऑफसेट प्रिंटिंग की नींव बनी।
कीर्तिमान डेस्क
06 Aug 2026, 01:36 PM
दुर्ग
आज के समय में अखबार कुछ ही मिनटों में तैयार हो जाते हैं, पोस्टर और डिजाइन कंप्यूटर पर बनकर तुरंत प्रिंट हो जाते हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के दौर में तो कुछ ही सेकंड में तस्वीरें और ग्राफिक्स तैयार किए जा सकते हैं। मोबाइल के एक क्लिक पर कोई भी तस्वीर लाखों लोगों तक पहुंच जाती है। लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब न कंप्यूटर था, न ऑफसेट मशीन और न ही डिजिटल प्रिंटिंग की सुविधा। उस दौर में कला और सूचनाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए एक खास तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था, जिसे लिथोग्राफी यानी छापा कला कहा जाता है। इस तकनीक में एक विशेष पत्थर पर चित्र बनाए जाते थे और उसी पत्थर की मदद से अखबार, पोस्टर, कैलेंडर, विज्ञापन और देवी-देवताओं के चित्रों की हजारों प्रतियां तैयार की जाती थीं।
पत्थर से छपाई की परंपरा कायम
देश के गिने-चुने संस्थानों में शामिल राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में आज भी विद्यार्थी पारंपरिक लिथोग्राफी तकनीक सीखते हैं। यहां जर्मनी से लाए गए विशेष लाइमस्टोन (चूना पत्थर) पर कलाकार अपनी कलाकृतियां तैयार करते हैं और ब्रिटिशकालीन लिथोग्राफी प्रेस के माध्यम से प्रिंट निकालने का अभ्यास करते हैं। यह स्टूडियो केवल एक प्रशिक्षण केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय प्रिंट कला के इतिहास को संजोकर रखने वाला एक महत्वपूर्ण स्थान है। आधुनिक डिजिटल तकनीक के बीच भी यहां कलाकार हाथों से पत्थर तैयार करते हैं, उस पर चित्र बनाते हैं और फिर पुराने तरीके से प्रिंट तैयार करते हैं।
खैरागढ़ में आज भी सुरक्षित है लिथोग्राफी की ऐतिहासिक विरासत
लिथोग्राफी की कहानी
लिथोग्राफी का आविष्कार वर्ष 1796 में जर्मनी के कलाकार एलोयस सेनेफेल्डर ने किया था। उस समय उनका उद्देश्य था कि कला और जरूरी सूचनाएं केवल राजमहलों और अमीर वर्ग तक सीमित न रहें, बल्कि आम लोगों तक भी पहुंच सकें। सेनेफेल्डर ने ऐसे चूना पत्थर की खोज की, जो तेल और पानी के अलग-अलग व्यवहार के सिद्धांत पर काम करता था। इसी विशेषता के कारण पत्थर पर बनाई गई तस्वीर को बार-बार प्रिंट किया जा सकता था। इस तकनीक ने छपाई की दुनिया में बड़ा बदलाव लाया। एक ही चित्र की सैकड़ों और हजारों प्रतियां कम समय में तैयार होने लगीं। इससे कला, शिक्षा और सूचना के प्रसार को नई गति मिली।
भारत में गोवा से पहुंची लिथोग्राफी
भारत में लिथोग्राफी तकनीक सबसे पहले गोवा पहुंची थी। शुरुआत में इसका उपयोग धार्मिक साहित्य और बाइबल जैसे ग्रंथों की छपाई के लिए किया गया। धीरे-धीरे यह तकनीक भारतीय कला जगत का हिस्सा बन गई। महान चित्रकार राजा रवि वर्मा ने इस तकनीक को नई पहचान दिलाई। वर्ष 1894 में उन्होंने अपना लिथोग्राफी प्रेस स्थापित किया और रामायण, महाभारत तथा पुराणों से जुड़े देवी-देवताओं के चित्रों को बड़ी संख्या में छापकर आम लोगों तक पहुंचाया। इससे पहले देवी-देवताओं के चित्र मुख्य रूप से राजमहलों और मंदिरों तक सीमित रहते थे, लेकिन लिथोग्राफी के माध्यम से ये चित्र आम लोगों के घरों की दीवारों तक पहुंचने लगे। भारतीय कला पहली बार बड़े स्तर पर जनसामान्य तक पहुंची।
ऑफसेट का आधार बनी लिथोग्राफी
राजकुमारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के लेक्चरर डॉ. मनिंदर सिंह के अनुसार, आज इस्तेमाल होने वाली ऑफसेट प्रिंटिंग तकनीक की बुनियाद भी लिथोग्राफी में ही छिपी हुई है। उन्होंने बताया कि आधुनिक CMYK कलर प्रिंटिंग का सिद्धांत भी इसी तकनीक से विकसित हुआ है। पुराने समय में रंगीन चित्र तैयार करने के लिए हर रंग के लिए अलग पत्थर तैयार किया जाता था। इसके बाद सभी रंगों को एक निश्चित क्रम में छापकर अंतिम चित्र तैयार किया जाता था। यानी आज जिस तकनीक से अखबार, किताबें और बड़े पैमाने पर रंगीन सामग्री छापी जाती है, उसकी शुरुआत कहीं न कहीं इसी पारंपरिक छापा कला से हुई थी।
पत्थर, पानी और स्याही से तैयार होती है लिथोग्राफी की अनोखी कला
लिथोग्राफी स्टूडियो की खास पहचान
खैरागढ़ विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पहचान उसका लिथोग्राफी स्टूडियो है। यहां आज भी ब्रिटिशकालीन लिथोग्राफी प्रेस सुरक्षित रखा गया है। इस प्रेस को विभाग के वरिष्ठ कलाकार प्रो. वी. नागदास इंग्लैंड से विश्वविद्यालय लेकर आए थे। इसके साथ ही बड़ी संख्या में पुराने और मूल लिथोग्राफी स्टोन भी यहां संरक्षित हैं। ये पत्थर केवल उपकरण नहीं, बल्कि कला और प्रिंटिंग इतिहास के जीवंत प्रमाण हैं। इनकी मदद से विद्यार्थी यह समझते हैं कि आधुनिक प्रिंटिंग तकनीक के आने से पहले कलाकार किस तरह मेहनत और धैर्य के साथ अपनी कला को लोगों तक पहुंचाते थे।
प्रिंटिंग की नींव है लिथोग्राफी
प्रोफेसर रबी नारायण गुप्ता बताते हैं कि लिथोग्राफी केवल एक कला माध्यम नहीं है, बल्कि यह प्रिंट मीडिया की शुरुआती और महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक रही है। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में अखबार, सरकारी घोषणाएं, पोस्टर, विज्ञापन और कैलेंडर तक इसी माध्यम से तैयार किए जाते थे। उस समय लिथोग्राफी ने सूचना के प्रसार में क्रांतिकारी भूमिका निभाई थी।
भले ही आज डिजिटल तकनीक ने इसकी जगह काफी हद तक ले ली है, लेकिन फाइन आर्ट और प्रिंट मेकिंग के क्षेत्र में इसका महत्व आज भी बना हुआ है।