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इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला
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इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला : पति की सैलरी का 25% देना कोई तय नियम नहीं, फैमिली कोर्ट के आदेश में किया बदलाव

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि पति की कुल सैलरी का 25 प्रतिशत हिस्सा देना कोई तय नियम नहीं है। अदालत ने कानपुर देहात के एक मामले में पत्नी के भत्ते को ₹12 हजार से बढ़ाकर ₹20 हजार प्रति माह कर दिया।

कीर्तिमान न्यूज
15 Jul 2026, 12:11 PM
इलाहाबाद
वैवाहिक विवादों और तलाक के मुकदमों में गुजारा भत्ते (Maintenance) को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ किया है कि अलग रह रही पत्नी को पति की कुल सैलरी का 25 प्रतिशत हिस्सा गुजारा भत्ते के रूप में देना कोई अनिवार्य या बंधा-बंधाया नियम नहीं है। 
हाई कोर्ट के इस रुख से उन पतियों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, जो कोर्ट में भत्ते की भारी-भरकम राशि को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। यह पूरा मामला कानपुर देहात की एक फैमिली कोर्ट के फैसले से जुड़ा है, जिसे अब हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 
इलाहाबाद कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
दरअसल, कानपुर देहात की फैमिली कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए पति को अपनी सैलरी के हिसाब से हर महीने 12 हजार रुपये से ज्यादा का गुजारा भत्ता पत्नी को देने का आदेश दिया था। पति इस फैसले से संतुष्ट नहीं था, जिसके बाद उसने निचली अदालत (Family Court) के इस आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
'सिर्फ जिंदा रहना काफी नहीं, सम्मान से जीना हक' 
अदालत ने कहा: "गुजारा भत्ते का असल मकसद यह सुनिश्चित करना है कि पत्नी सिर्फ किसी तरह जिंदा न रहे, बल्कि वह पूरी गरिमा और सम्मान के साथ अपना जीवन जी सके।"

पत्नी गुजारा भत्ता पाने की हकदार 

कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड के मुताबिक पत्नी के पास कमाई का कोई ऐसा जरिया नहीं था जिससे वह अपना पेट पाल सके, जबकि पति आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम था। ऐसे में पत्नी गुजारा भत्ता पाने की हकदार थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में कुछ ऐसी शर्तें जरूर हैं जिनके तहत गुजारा भत्ता रोका जा सकता है, लेकिन इस मामले में पत्नी ने ऐसी किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया था। 

12 से बढ़ाकर 20 हजार गुजारा भत्ता

हाई कोर्ट ने जब मामले के दस्तावेजों और पति की वित्तीय स्थिति को देखा, तो सामने आया कि पति की ग्रॉस सैलरी 86,674 रुपये थी, जिसमें से टैक्स और कटौतियों के बाद ₹67,043 उसके खाते में आते थे। हाई कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट (फैमिली कोर्ट) ने गुजारा भत्ते की रकम तय करने में थोड़ी जल्दबाजी दिखाई और उपलब्ध आंकड़ों का सही आकलन नहीं किया। अदालत ने मामले की गंभीरता और पति की इन-हैंड सैलरी को देखते हुए गुजारा भत्ते की राशि को 12 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये महीना कर दिया। 

गुजारा भत्ते की रकम तय करना निचली अदालतों का काम 

इस फैसले के साथ ही हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आमतौर पर गुजारा भत्ते की रकम तय करना निचली अदालतों का काम होता है और वे इसमें बार-बार दखल नहीं देते। लेकिन अगर ट्रायल कोर्ट का निष्कर्ष पूरी तरह तर्कहीन हो, जरूरी सबूतों की अनदेखी की गई हो या कानूनी सिद्धांतों को गलत तरीके से लागू कर किसी के साथ अन्याय किया गया हो, तो हाई कोर्ट को मामले में हस्तक्षेप करना ही पड़ता है।
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