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ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ एक बार फिर आक्रामक रुख अपनाया
ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ एक बार फिर आक्रामक रुख अपनाया
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ईरान : अमेरिका और इजरायल की रणनीति हुई नाकाम, हम पहले से ज्यादा मजबूत

ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के वरिष्ठ अधिकारी यादोल्लाह जावानी ने दावा किया है कि अमेरिका और इजरायल ईरान को कमजोर करने के अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके। उन्होंने कहा कि तमाम सैन्य दबाव, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव के बावजूद ईरान पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा है। जावानी ने यह भी कहा कि अब अमेरिका के सामने केवल दो विकल्प बचे हैं—या तो क्षेत्रीय वास्तविकताओं को स्वीकार करते हुए कूटनीतिक रास्ता अपनाए या फिर टकराव की नीति जारी रखकर और अधिक नुकसान उठाए।

कीर्तिमान नेटवर्क
31 May 2026, 05:33 PM
तेहरान
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ एक बार फिर आक्रामक रुख अपनाया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के वरिष्ठ अधिकारी यादोल्लाह जावानी ने कहा है कि ईरान को कमजोर करने और उसकी राजनीतिक व्यवस्था को अस्थिर करने की कोशिशें विफल रही हैं। उनका दावा है कि हाल के संघर्षों ने ईरान को कमजोर नहीं बल्कि और अधिक संगठित तथा मजबूत बनाया है। इस बयान को ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और कूटनीतिक तनाव दोनों बढ़े हुए हैं।

ईरान ने विरोधियों गलत आकलन

आईआरजीसी के राजनीतिक मामलों के उप प्रमुख यादोल्लाह जावानी के अनुसार अमेरिका और इजरायल ने यह मान लिया था कि सैन्य दबाव और आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए ईरान को जल्द झुकाया जा सकता है। लेकिन उनके मुताबिक वास्तविकता इसके विपरीत रही। जावानी का कहना है कि ईरानी जनता और शासन व्यवस्था ने चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी एकजुटता बनाए रखी और देश की रणनीतिक क्षमता पहले से अधिक मजबूत हुई। उन्होंने कहा कि विरोधी देशों ने ईरान की सैन्य क्षमता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और क्षेत्रीय प्रभाव का सही आकलन नहीं किया, जिसके कारण उनकी रणनीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी।

अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई 

जावानी ने दावा किया कि अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के खिलाफ सैन्य दबाव और हवाई हमलों की रणनीति अपनाई गई थी। उनका आरोप है कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य ईरान की सुरक्षा संरचना को कमजोर करना और देश के भीतर अस्थिरता पैदा करना था। ईरानी अधिकारी का कहना है कि इन प्रयासों से ईरान को कोई निर्णायक नुकसान नहीं हुआ और देश ने अपनी रक्षा क्षमता तथा क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखा।

ईरान का पक्ष 

ईरानी नेतृत्व लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बदल रहा है। तेहरान का मानना है कि क्षेत्र में उसके सहयोगी समूहों और मित्र देशों की मौजूदगी ने उसकी रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया है। ईरान यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और कूटनीतिक अलगाव के बावजूद वह क्षेत्रीय राजनीति में एक प्रभावशाली शक्ति बना हुआ है। यही कारण है कि ईरानी अधिकारी लगातार अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत को लेकर आत्मविश्वास भरे बयान दे रहे हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य 

ईरानी अधिकारियों और मीडिया में समय-समय पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर रणनीतिक महत्व का उल्लेख किया जाता रहा है। होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में उसकी भौगोलिक स्थिति उसे महत्वपूर्ण रणनीतिक बढ़त देती है। हालांकि "500 साल बाद हक मिलने" जैसे दावों को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं और इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई सर्वमान्य पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

अमेरिका के सामने दो विकल्प

जावानी के अनुसार अब अमेरिका के सामने दो ही रास्ते बचे हैं। पहला, वह क्षेत्रीय वास्तविकताओं को स्वीकार करे, ईरान के साथ टकराव कम करे और कूटनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़े। दूसरा, वह दबाव और टकराव की नीति जारी रखे, जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता बढ़ सकती है। ईरानी अधिकारी का कहना है कि सैन्य दबाव की नीति अब तक अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी है और भविष्य में भी इससे समाधान निकलना मुश्किल होगा।

मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव

ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी तनाव पिछले कुछ वर्षों में कई बार खुलकर सामने आ चुका है। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंध और सैन्य गतिविधियां लगातार विवाद का कारण बनी हुई हैं।  यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते हैं तो पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।

दुनिया की नजर घटनाओं पर

ईरान के इस ताजा बयान ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि क्षेत्रीय तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर होगी कि अमेरिका, इजरायल और ईरान आने वाले समय में किस प्रकार की रणनीति अपनाते हैं।
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