Kamar Chhath Puja: संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना को लेकर मनाया जाने वाला लोकपर्व कमरछठ (हलषष्ठी) 2 सितंबर को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। पर्व को लेकर आरंग-लखौली समेत आसपास के ग्रामीण इलाकों में तैयारियां लगभग पूरी हो चुकी हैं। माताएं अपनी संतान की सलामती और सुखी जीवन की कामना के लिए दिनभर निर्जला व्रत रखेंगी। कमरछठ को मातृत्व के त्याग और ममता से जुड़ा प्रमुख लोकपर्व माना जाता है। पर्व को लेकर महिलाओं में खास उत्साह है। सुबह से ही महिलाएं पूजा की तैयारियों में जुटी हुई हैं। घरों में पूजन सामग्री जुटाने के साथ शाम के सामूहिक पूजन के लिए सगरी तैयार की जा रही है।
सगरी सजाकर होगी हलषष्ठी माता की पूजा
शाम के समय मोहल्लों और बस्तियों में मिट्टी से सगरी यानी छोटा तालाब बनाया जाएगा। इसे कांस, बेर और महुआ की डालियों से सजाया जाएगा। इसके बाद महिलाएं सगरी के आसपास एकत्र होकर हलषष्ठी माता की पूजा करेंगी। इस दौरान व्रत कथा का श्रवण भी किया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में कमरछठ का सामूहिक आयोजन इसकी खास पहचान है। महिलाएं एक-दूसरे के साथ मिलकर पूजा की तैयारियां करती हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार पर्व मनाती हैं।पसहर चावल और महुआ की बढ़ी मांग
कमरछठ को देखते हुए स्थानीय बाजारों में भी रौनक बढ़ गई है। पूजा के लिए जरूरी पारंपरिक सामग्रियों की खरीदारी में महिलाएं जुटी हैं। इस दौरान पसहर चावल, महुआ, छछान भाजी, लाई और छह प्रकार के अनाज का विशेष महत्व रहता है। कमरछठ में बिना हल चलाए खेतों में उगने वाले पसहर चावल का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा महुआ और अन्य पारंपरिक खाद्य सामग्री भी पूजा का हिस्सा होती हैं। पर्व नजदीक आने के साथ इन वस्तुओं की मांग बढ़ने से बाजारों में भी चहल-पहल देखने को मिल रही है।
कमरछठ केवल संतान की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना से जुड़ा व्रत ही नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की लोकपरंपराओं और ग्रामीण संस्कृति को सहेजने वाला पर्व भी है। पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के जरिए नई पीढ़ी भी इस लोकपर्व और इससे जुड़ी मान्यताओं से परिचित हो रही है।
