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डीघारी गांव में नागपंचमी पर नागदेवता की पूजा
डीघारी गांव में नागपंचमी पर नागदेवता की पूजा
रायपुर संभाग

डीघारी में नागपंचमी की अनोखी परंपरा, सर्पों की रक्षा का निभाया जाता है संकल्प

छत्तीसगढ़ के आरंग विकासखंड का ग्राम डीघारी ‘सर्प की वरदानी’ के नाम से प्रसिद्ध है। लोककथा के अनुसार मालगुजार पोहकल दुबे को नागदेवता से मिले वरदान के बाद गाँव में सर्पों को न मारने की परंपरा शुरू हुई। आज भी नागपंचमी पर ग्रामीण सामूहिक पूजा करते हैं और सर्प दिखने पर उसे सुरक्षित स्थान पर छोड़ते हैं। यह परंपरा लोकविश्वास, जीव-दया और ग्रामीण एकजुटता की मिसाल बनी हुई है।

कीर्तिमान न्यूज | अप्पू धीवर
प्रकाशित: 16 Aug 2026, 02:37 PM · अपडेट: 27 Sep 2026, 08:08 AM
आरंग
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
मोहनदास मानिकपुरी
छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी महानदी की मुख्य नहर के किनारे बसा ग्राम डीघारी अपनी अनोखी लोकपरंपरा और सर्पों के प्रति अटूट आस्था के लिए अंचल में विशिष्ट पहचान रखता है। आरंग विकासखंड का यह गाँव लंबे समय से ‘सर्प की वरदानी’ के नाम से विख्यात है। यहाँ नागपंचमी का पर्व केवल धार्मिक पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही लोककथा, प्रकृति-प्रेम और ग्रामीण एकजुटता की मिसाल है।​ 

स्वप्न में आए नाग 

गाँव में प्रचलित कथा के अनुसार करीब सात-आठ पीढ़ी पूर्व डीघारी के मालगुजार पोहकल दुबे को नागपंचमी की पूर्व रात्रि एक स्वप्न आया। स्वप्न में एक नाग उनके घर के द्वार पर तुलसी चौरा के पास कुंडली मारकर बैठा दिखा, जिसके गले में कांटा फंसा हुआ था और उसने मालगुजार से सहायता मांगी। सुबह जब पोहकल दुबे उठे तो स्वप्न का दृश्य हकीकत में बदला मिला। उन्होंने तुरंत गाँव के प्रमुख लोगों को बुलाकर पूरी बात बताई और निष्पाप भाव से तालाब में स्नान कर सफेद धोती-बनियान पहनकर नाग के पास पहुँचे। उन्होंने अत्यंत धैर्यपूर्वक नाग के गले से कांटा निकाला और उसे तालाब किनारे खेत के पास छोड़ दिया।​

वरदान में मांगी गांव की सुरक्षा 

उसी रात मालगुजार को फिर स्वप्न आया, जिसमें नागदेवता ने प्रसन्न होकर वरदान मांगने को कहा। पोहकल दुबे ने अपने व्यक्तिगत हित के बजाय गाँव की सुरक्षा मांगी कि गाँव की सीमा के भीतर रहने वाले ग्रामीणों व बाहर जाकर रहने वाले किसी भी ग्रामीण को कभी सर्पदंश से हानि न हो। अनजाने में यदि पैर भी लग जाए या खुदाई के दौरान सर्प निकल आए, तब भी वह किसी को नुकसान न पहुँचाए। तभी से डीघारी में सर्पों को न मारने की अनूठी परंपरा चली आ रही है। आज भी गाँव में सर्प दिखने पर हिंसा के बजाय उसे सुरक्षित रूप से तालाब पार छोड़ दिया जाता है।​

नागपंचमी को होती है विशेष पूजा-अर्चना

नागपंचमी के दिन आज भी गाँव का कोटवार गलियों में मुनादी कर ग्रामीणों को इस प्राचीन संकल्प की याद दिलाता है। इसके बाद पूरा गाँव एकजुट होकर तालाब पार स्थित नाग मंदिर पहुँचता है और विधि-विधान से सामूहिक पूजा-अर्चना करता है। आधुनिकता के इस दौर में भी लोकविश्वास, जीव-दया और ग्रामीण एकजुटता की यह पावन परंपरा डीघारी की माटी में पूरी भव्यता के साथ जीवंत है।
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