Kanwar Yatra: सावन का महीना आते ही चारों ओर बोल बम और हर-हर महादेव के जयकारे गूंजते हैं। कोई कांवड़ यात्रा कर शिवलिंग पर जल चढ़ाता है तो कोई व्रत-उपवास और अभिषेक कर भोलेनाथ की आराधना करता है। लेकिन इसी भीड़ में एक शिवभक्त ऐसा भी है, जिसकी पहचान उसकी आवाज नहीं बल्कि चार दशक से चली आ रही खामोशी है। समीपस्थ राम जुनवानी निवासी एवं चंडी मंदिर ट्रस्ट के सदस्य बिसाहू राम विश्वकर्मा पिछले करीब 40 वर्षों से सावन के पूरे महीने मौन साधना करते आ रहे हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान उपवास रखते हैं और फलाहार पर रहते हैं। अब उनकी 9 वर्षीय पोती चांदनी भी दादा की राह पर चल पड़ी है।

जयकारों के बीच मौन रहता है यह भक्त
बिसाहू राम की कांवड़ यात्रा का दृश्य भी अपने आप में अलग होता है। रास्ते में शिवभक्तों के कंठ से बोल बम और हर-हर महादेव के जयकारे गूंजते रहते हैं, लेकिन बिसाहू राम इस दौरान पूरी तरह मौन रहते हैं। कांवड़ यात्रा के दिनों में अन्न का त्याग कर फलाहार करते हैं और पैदल यात्रा पूरी करते हैं। उनके लिए यह यात्रा केवल मंदिर तक पहुंचने का माध्यम नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही साधना का हिस्सा है।
बिसाहू राम ने बताया कि करीब 40 साल पहले उन्होंने सावन में मौन साधना और कांवड़ यात्रा का संकल्प लिया था। शुरुआती दौर में वे समीपस्थ पतोरा स्थित शिव मंदिर और सिरपुर सहित आसपास के शिवधामों तक कांवड़ यात्रा करते थे। बाद में शिवभक्त साथियों के साथ राजिम की महानदी से कांवड़ यात्रा शुरू कर दी।
भूतेश्वरनाथ से सिरपुर तक आस्था की लंबी यात्रा
राजिम से यात्रा शुरू होने के दौरान राजिम और छुरा-गरियाबंद क्षेत्र के शिवभक्त भी एकत्र होते हैं। गरियाबंद क्षेत्र के भक्त भूतेश्वरनाथ से जल लेकर पैदल कांवड़ यात्रा करते हुए राजिम पहुंचते हैं और कुलेश्वरनाथ मंदिर में जल चढ़ाते हैं। इसके बाद सभी भक्त राजिम से जल उठाकर चंपारण स्थित चंपेश्वर महादेव पहुंचते हैं और जलाभिषेक करते हैं। चंपारण से जल लेकर भक्त बमनी महासमुंद पहुंचते हैं, जहां शिवभक्तों की ओर से भंडारे का आयोजन भी किया जाता है। इसके बाद बमनी से जल लेकर सभी भक्त सिरपुर स्थित श्री गंधेश्वरनाथ महादेव मंदिर पहुंचते हैं। सावन के अंतिम सोमवार को जलाभिषेक के साथ कांवड़ यात्रा का समापन किया जाता है।
दादा की खामोशी ने पोती को भी सिखाई भक्ति
इस कहानी का सबसे दिलचस्प और भावुक पहलू बिसाहू राम की 9 वर्षीय पोती चांदनी है। कक्षा तीसरी में पढ़ने वाली चांदनी ने पिछले वर्ष अपने दादा की साधना को करीब से देखा और सावन में मौन व्रत रखने का संकल्प लिया। इस वर्ष उसका मौन साधना का दूसरा साल रहा। कांवड़ यात्रा के दौरान चांदनी भी अपने दादा की तरह उपवास रखती है और फलाहार करती है। इतनी कम उम्र में पूरे महीने मौन साधना करना परिवार ही नहीं, आसपास के लोगों के लिए भी चर्चा और आकर्षण का विषय बना हुआ है।
चार दशक की साधना में जुड़ी अगली पीढ़ी
बिसाहू राम के लिए इस वर्ष का सावन इसलिए भी खास रहा कि जिस साधना को उन्होंने चार दशक पहले शुरू किया था, वही आस्था अब उनकी पोती तक पहुंच गई है। दादा और पोती दोनों ने रक्षाबंधन पूर्णिमा के दिन अपने मौन व्रत का समापन किया। बिसाहू राम कहते हैं कि उनके लिए सावन की मौन साधना और कांवड़ यात्रा किसी दिखावे का हिस्सा नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति उनकी व्यक्तिगत आस्था और संकल्प है। पिछले करीब 40 वर्षों से जारी यह साधना अब परिवार की अगली पीढ़ी में भी दिखाई देने लगी है। एक तरफ सावन में गूंजते जयकारे, दूसरी तरफ चार दशक से खामोश एक शिवभक्त... और उसी खामोशी को अपनाती 9 साल की पोती—बिसाहू राम और चांदनी की यह कहानी भक्ति के उस रूप को सामने लाती है, जिसमें शब्द कम और संकल्प बड़ा है।
