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बीएसपी लोहा चोरी मामले की जांच
बीएसपी लोहा चोरी मामले की जांच
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खुलासा : राखड़ की आड़ में करोड़ों का लोहा पार, बीएसपी चोरी सिंडिकेट का नया राजफाश

भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) में 250 टन लोहे की चोरी मामले में जांच के दौरान चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। पुलिस के अनुसार, सरगना संजय सिंह के नेतृत्व में एक संगठित सिंडिकेट ने ईएसपी और फ्लू डस्ट परिवहन के ठेके की आड़ में चोरी को अंजाम दिया। चोरी के लोहे को ट्रकों में भरकर उसके ऊपर राखड़ (फ्लाई ऐश) की परत बिछाई जाती थी और तय समय पर प्लांट से बाहर निकाला जाता था।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
11 Jun 2026, 12:36 PM
दुर्ग

भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) में करीब 250 टन लोहे की चोरी के मामले में जांच आगे बढ़ने के साथ ही सिंडिकेट के काम करने के तरीके को लेकर चौंकाने वाले खुलासे सामने आए हैं। पुलिस जांच में पता चला है कि यह कोई सामान्य चोरी नहीं थी, बल्कि इसके लिए महीनों पहले से सुनियोजित नेटवर्क तैयार किया गया था। गिरोह ने प्लांट के भीतर ट्रकों, जेसीबी और अन्य मशीनों को वैध ठेकों के जरिए प्रवेश दिलाकर चोरी की पूरी व्यवस्था खड़ी कर ली थी।

जांच एजेंसियों के अनुसार गिरोह के सरगना संजय सिंह और उसके सहयोगियों को बीएसपी में ईएसपी डस्ट और फ्लू डस्ट उठाने का ठेका मिला था। इसी ठेके का फायदा उठाकर प्लांट के भीतर लोहे की चोरी का खेल शुरू किया गया। ट्रकों और मशीनों को नियमित कार्यों के लिए लगाया गया, जिससे उन पर किसी को संदेह न हो और उन्हें प्लांट के विभिन्न हिस्सों में आसानी से आवाजाही मिल सके।

राखड़ की परत के नीचे छिपाया जाता था चोरी का लोहा

पुलिस जांच में सामने आया है कि चोरी किए गए लोहे को ट्रकों में भरकर उसके ऊपर फ्लाई ऐश (राखड़) और डस्ट की मोटी परत बिछा दी जाती थी। इससे सुरक्षा जांच के दौरान ट्रक सामान्य डस्ट परिवहन वाहन दिखाई देता था। इसके बाद तय समय पर इन ट्रकों को प्लांट से बाहर निकाला जाता था। सूत्रों के मुताबिक प्रतिदिन लगभग 20 ट्रक प्लांट में डस्ट परिवहन के लिए जाते थे। इनमें से तीन ट्रकों का उपयोग लोहे की चोरी के लिए किया जाता था। गिरोह पहले से तय करता था कि किस दिन और कितनी मात्रा में चोरी का माल बाहर भेजा जाएगा। बाहर निकलने के बाद लोहे को गोदामों में उतारकर दूसरे वाहनों के जरिए सांठगांठ वाले उद्योगों और खरीदारों तक पहुंचाया जाता था।

ट्रांसपोर्टर कर्मचारियों की थी अहम भूमिका

पुलिस का दावा है कि ट्रांसपोर्टर कंपनी के कुछ कर्मचारियों की भूमिका भी संदिग्ध रही है। ये कर्मचारी प्लांट के भीतर ट्रकों की आवाजाही और तैनाती तय करते थे। साथ ही वे सुरक्षा व्यवस्था और गतिविधियों पर नजर रखते हुए गिरोह को जरूरी सूचनाएं उपलब्ध कराते थे।

गिरोह से जुड़े ड्राइवर और मशीन ऑपरेटर पहले अपने नियमित कार्य करते थे। खाली समय में वे प्लांट के विभिन्न हिस्सों का निरीक्षण कर ऐसे स्थानों की पहचान करते थे जहां लावारिस या अनुपयोगी लोहा पड़ा होता था। बाद में इसी सामग्री को चोरी कर ट्रकों में लोड किया जाता था।

इंट्री और एग्जिट की टाइमिंग पहले से रहती थी तय

जांच में यह भी सामने आया है कि चोरी के लिए उपयोग होने वाले ट्रकों की एंट्री और एग्जिट का पूरा शेड्यूल पहले से तैयार रहता था। ट्रक पहले डस्ट लोड करने के नाम पर अंदर जाते थे और बाद में नो-एंट्री या कम निगरानी वाले समय का इंतजार किया जाता था। जैसे ही मौका मिलता, चोरी के लोहे से भरे ट्रकों को बाहर निकाल दिया जाता था। गिरोह ने सीसीटीवी निगरानी को भ्रमित करने के लिए एक ही रंग के कई ट्रक खरीदे थे। यदि किसी पीले रंग के ट्रक में चोरी का माल लोड किया गया तो उसी रंग का दूसरा ट्रक प्लांट में प्रवेश करता था। सीसीटीवी फुटेज में देखने पर ऐसा लगता था कि वही वाहन अंदर गया और वही बाहर आया है, जबकि वास्तव में ट्रकों की अदला-बदली कर दी जाती थी।

नंबर प्लेट और GPS बदलने का संगठित खेल

पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि डस्ट से लोड ट्रकों का वजन होने के बाद उनके GPS डिवाइस और नंबर प्लेट निकाल लिए जाते थे। इसके बाद इन्हें उस ट्रक में लगाया जाता था जिसमें चोरी का लोहा भरा गया होता था। इस तरह रिकॉर्ड में वही वाहन दिखाई देता था जो वैध रूप से प्लांट में दाखिल हुआ था, जबकि वास्तविक माल दूसरे ट्रक में बाहर निकल जाता था।

गिरोह ने तौल कांटे की प्रक्रिया का भी दुरुपयोग किया। पहले डस्ट से भरे ट्रक का वजन कराया जाता था। फिर चोरी के लोहे वाले ट्रक में वही नंबर प्लेट और GPS लगाकर उसे तौल कांटे तक पहुंचाया जाता था। इस तरह दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड में किसी प्रकार की गड़बड़ी दिखाई नहीं देती थी।

अब तक 8 आरोपी गिरफ्तार, जांच जारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने अब तक आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। पूछताछ में लगातार नए खुलासे हो रहे हैं और जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस पूरे नेटवर्क में और कौन-कौन लोग शामिल थे। आशंका है कि चोरी के इस संगठित सिंडिकेट में कई स्तरों पर लोगों की मिलीभगत रही है। प्रारंभिक जांच के अनुसार करीब 250 टन लोहे की चोरी से बीएसपी को करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचा है। पुलिस अब चोरी किए गए माल की अंतिम खपत, खरीददारों और संबंधित उद्योगों की भूमिका की भी जांच कर रही है। आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़ी गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है।
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