भारतीय राजनीति के गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर आ रही है। संसद के उच्च सदन (राज्यसभा) में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की राह अब न केवल आसान दिख रही है, बल्कि विपक्ष के गढ़ों में मची भगदड़ ने सरकार को बेहद मजबूत स्थिति में ला खड़ा किया है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसदों का पाला बदलना, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अब तक का सबसे बड़ा विद्रोह और तमिलनाडु में थलपति विजय के उभार ने देश के सियासी समीकरणों को पूरी तरह पलट दिया है।
बंगाल में ऐतिहासिक भूचाल
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अप्रत्याशित मोड़ आ गया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी अपने इतिहास के सबसे बड़े विभाजन का सामना कर रही है।
विधायकों की बगावत: टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 विधायकों के एक बड़े बागी गुट ने सीधे तौर पर ममता बनर्जी के फैसलों को चुनौती दे दी है।
बदला समीकरण: इस बागी गुट ने ममता बनर्जी की पसंद के खिलाफ जाकर ऋतब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता चुन लिया है। 1998 में पार्टी की स्थापना के बाद से यह टीएमसी में अब तक की पहली आधिकारिक और सबसे बड़ी टूट मानी जा रही है, जिसका सीधा असर राज्यसभा की आगामी सीटों पर पड़ेगा।
डीएमके और कांग्रेस के रास्ते अलग?
दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु से आ रही खबरें विपक्षी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के लिए बड़ा झटका हैं। अभिनेता से नेता बने थलपति विजय की पार्टी (TVK) के उभार के बाद समीकरण बदल गए हैं।
बदली वफादारियां: माना जा रहा है कि कांग्रेस अब तमिलनाडु में विजय के नेतृत्व वाली टीवीके के साथ नए विकल्प तलाश रही है।
DMK की नई रणनीति: कांग्रेस के इस कदम से अलग-थलग पड़ी डीएमके अब अपने अस्तित्व और प्रभाव को बचाने के लिए नए विकल्पों पर विचार कर रही है। सूत्रों की मानें तो डीएमके अपनी धुर विरोधी एआईएडीएमके (AIADMK) को बाहरी समर्थन देने जैसे कड़े और चौंकाने वाले फैसलों पर भी विचार कर रही है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
'आप' (AAP) सांसदों का विलय
राज्यसभा के भीतर सरकार के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी आम आदमी पार्टी के खेमे से आई है।
बीजेपी की ताकत बढ़ी: 'आप' के 7 राज्यसभा सांसदों के भाजपा में विलय को राज्यसभा अध्यक्ष की हरी झंडी मिल चुकी है। इस मंजूरी के बाद उच्च सदन में भाजपा की व्यक्तिगत संख्या 106 से बढ़कर 113 हो गई है।
बहुमत से बहुत आगे: इस विलय के साथ ही राज्यसभा में NDA की कुल ताकत 145 तक पहुंच गई है। सदन में साधारण बहुमत के लिए केवल 123 सीटों की आवश्यकता होती है, जिससे सरकार पूरी तरह सुरक्षित है।
मिशन 165: अब सरकार का लक्ष्य दो-तिहाई बहुमत यानी 164-165 का जादुई आंकड़ा छूना है। नवंबर 2026 तक होने वाले राज्यसभा चुनावों में विपक्ष के इस बिखराव का सीधा फायदा उठाकर NDA इस आंकड़े को 150 के पार ले जाने की तैयारी में है। बीजेपी अब संसद में इस आंकड़े को पक्का करने के लिए डीएमके (DMK) के 22 लोकसभा और 8 राज्यसभा सांसदों के साथ मुद्दों के आधार पर बाहरी समर्थन जुटाने की संभावनाएं तलाश रही है।
सरकार के लिए क्यों जीवन-मरण का प्रश्न है 'दो-तिहाई' बहुमत?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत अगर सरकार को कोई भी बड़ा या ऐतिहासिक संवैधानिक संशोधन करना है, तो उसे संसद के दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई (विशेष) बहुमत की सख्त जरूरत होती है। साधारण बहुमत से ऐसे बिल पास नहीं हो सकते।
हालिया झटके, जिन्होंने बीजेपी को रणनीति बदलने पर मजबूर किया:
महिला आरक्षण और परिसीमन बिल का गिरना: हाल ही में (अप्रैल 2026 में), लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा न होने के कारण महिलाओं को 33% आरक्षण देने और सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करने से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिर गया था। इसने सरकार को सचेत कर दिया।
आगामी बड़े एजेंडे दांव पर: मोदी सरकार के आगामी कार्यकाल के सबसे बड़े प्रोजेक्ट्स जैसे 'एक देश एक चुनाव' (One Nation One Election) और देशव्यापी परिसीमन बिल को अमलीजामा पहनाना बिना दो-तिहाई बहुमत के पूरी तरह असंभव है।
निष्कर्ष: यही कारण है कि बीजेपी ने अब आक्रामक रुख अपनाते हुए विभिन्न क्षेत्रीय दलों के असंतुष्ट धड़ों और सांसदों को अपने पाले में लाने की कोशिशें तेज कर दी हैं, ताकि साल 2026 के अंत तक राज्यसभा में एक ऐसा अजेय बहुमत तैयार किया जा सके जिससे देश के ढांचे को बदलने वाले बड़े कानूनों को बिना किसी बाधा के पास कराया जा सके।
