राजधानी दिल्ली में आज विपक्षी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के 23 प्रमुख दलों की एक बेहद महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। केंद्र सरकार को घेरने और भविष्य की संसदीय रणनीति तैयार करने के लिए बुलाई गई इस बैठक से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। तमिलनाडु के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) की पार्टी तमिलगा वेत्त्री कझगम (TVK) इस बैठक का हिस्सा नहीं है।
हाल ही में संपन्न हुए तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद पैदा हुए समीकरणों के बीच टीवीके ने कांग्रेस और अन्य सहयोगियों के समर्थन से सरकार तो बना ली है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इस महाबैठक से दूरी बनाए रखने के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में सवाल तैरने लगे हैं। आखिर इस दूरी के पीछे क्या रणनीतिक मजबूरियां हैं? राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसके पीछे 5 मुख्य कारण दिखाई दे रहे हैं:
संसद में शून्य प्रतिनिधित्व: रणनीति केवल 'संसदीय' है
मुख्य कारण: टीवीके हाल ही में क्षेत्रीय स्तर पर उभरी है और वर्तमान में लोकसभा या राज्यसभा में उसका एक भी सांसद नहीं है।
रणनीति: आज की यह बैठक मुख्य रूप से संसद के भीतर केंद्र सरकार की नीतियों, पश्चिम एशिया संकट और देश की आर्थिक स्थिति जैसे राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर संयुक्त रणनीति बनाने के लिए बुलाई गई है। जब तक संसद में टीवीके की मौजूदगी नहीं होती, तब तक राष्ट्रीय स्तर के इस विधायी गठबंधन में उसकी भागीदारी का कोई व्यावहारिक औचित्य नहीं बनता।
'INDIA' ब्लॉक में औपचारिक एंट्री का न होना
स्थानीय बनाम राष्ट्रीय: तमिलनाडु में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनने के बाद कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई और मुस्लिम लीग जैसे दलों ने राज्य की स्थिरता के लिए सीएम विजय की सरकार को बाहर से या गठबंधन के तहत समर्थन दिया है।
गठबंधन का स्वरूप: जानकारों का मानना है कि यह गठबंधन पूरी तरह से 'लोकल पॉलिटिकल मैनेजमेंट' (स्थानीय व्यवस्था) है। टीवीके ने अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया ब्लॉक की औपचारिक सदस्यता ग्रहण नहीं की है।
डीएमके (DMK) की नाराजगी और संस्थापक होने का रसूख
बहिष्कार का संकट: द्रमुक (DMK) 'इंडिया' गठबंधन के सबसे शुरुआती और मजबूत संस्थापक स्तंभों में से एक है। तमिलनाडु में कांग्रेस द्वारा डीएमके को छोड़कर टीवीके के साथ सरकार बनाने से एम.के. स्टालिन काफी नाराज बताए जा रहे हैं।
बड़ा सियासी पेंच: चर्चा है कि स्टालिन ने इसी नाराजगी के चलते इस बैठक से दूरी बनाई है या इसके बहिष्कार का मन बनाया है। ऐसे में अगर इंडिया ब्लॉक टीवीके को बैठक में बुलाता, तो वह अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद साथी (DMK) को पूरी तरह खो देता, जो अब तमिलनाडु में मुख्य विपक्ष की भूमिका में है।
भविष्य के राजनीतिक रास्ते खुले रखने की चाहत
विरोधाभासी समीकरण: थलपति विजय की टीवीके तमिलनाडु चुनाव में डीएमके और कांग्रेस दोनों के खिलाफ लड़कर ही राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है।
दूरगामी रणनीति: यदि सीएम विजय अभी से खुद को राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक के साथ पूरी तरह टैग कर लेते हैं, तो भविष्य के लिए उनके राजनीतिक विकल्प बेहद सीमित हो जाएंगे। फिलहाल वह 'मुद्दों के आधार पर समर्थन' की स्वतंत्र नीति अपनाकर अपनी सियासी जमीन को और मजबूत करना चाहते हैं।
द्रविड़ राजनीति के 'विकल्प' का अस्तित्व बचाना
वोटर भ्रम का डर: तमिलनाडु की जमीन पर टीवीके और डीएमके एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। विजय की सियासत की बुनियाद ही डीएमके की परंपरागत द्रविड़ राजनीति के एक 'सशक्त विकल्प' के रूप में रखी गई है।
बड़ा संदेश: यदि सीएम विजय दिल्ली में एम.के. स्टालिन या उनके प्रतिनिधियों के साथ एक ही मंच साझा करते हैं, तो तमिलनाडु के मतदाताओं के बीच एक बेहद गलत संदेश जाएगा और जमीनी स्तर पर उनके कार्यकर्ताओं में भारी भ्रम पैदा हो सकता है।
इनसाइड ट्रैक: राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि सीएम विजय की यह 'दूरी' एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वह फिलहाल राज्य में अपनी नई नवेली सरकार को स्थिर करने और तमिलनाडु की राजनीति में खुद को स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, न कि दिल्ली की राष्ट्रीय राजनीति की उलझनों में फंसने पर।
