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महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का संरक्षण एवं जीर्णोद्धार
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का संरक्षण एवं जीर्णोद्धार
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महाकाल मंदिर : शुरू होगा स्ट्रक्चरल रिपेयर, आधुनिक तकनीक से मजबूत होंगे प्राचीन हिस्से

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर और आसपास के प्राचीन मंदिरों के संरक्षण एवं जीर्णोद्धार के लिए 7 करोड़ 41 लाख रुपये की बड़ी परियोजना तैयार की गई है। मौसम, जल रिसाव और भारी श्रद्धालु संख्या के कारण मंदिर परिसर की कई संरचनाओं में दरारें और कमजोरियां सामने आने के बाद अब वैज्ञानिक और पारंपरिक तकनीकों की मदद से मरम्मत कार्य किया जाएगा। सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI) ने इसके लिए तकनीकी दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

प्रकाशित: 26 May 2026, 04:19 PM · अपडेट: 11 Sep 2026, 02:34 PM
उज्जैन
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग और उसके आसपास स्थित प्राचीन मंदिरों के संरक्षण एवं जीर्णोद्धार के लिए एक बड़ी परियोजना तैयार की गई है। देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल महाकालेश्वर मंदिर की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए प्रशासन ने इसके संरक्षण के लिए 7 करोड़ 41 लाख रुपये की योजना बनाई है। इस परियोजना का उद्देश्य मंदिर की प्राचीन वास्तुकला को सुरक्षित रखते हुए उसकी मजबूती और संरचनात्मक स्थिरता को लंबे समय तक बनाए रखना है। अधिकारियों के अनुसार मंदिर परिसर में लंबे समय से मौसम के प्रभाव, जल रिसाव और श्रद्धालुओं की भारी आवाजाही के कारण कई हिस्सों में संरचनात्मक समस्याएं सामने आ रही थीं। अब वैज्ञानिक और पारंपरिक तकनीकों के संयोजन से इन समस्याओं को दूर किया जाएगा। इस पूरे कार्य के लिए सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CBRI) ने विशेष तकनीकी दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनके आधार पर मंदिरों के स्ट्रक्चरल रिपेयर और रिहैबिलिटेशन कार्य के लिए एजेंसियों के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

मौसम और जल रिसाव

महाकाल मंदिर देश के सबसे प्राचीन और प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है, जहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लगातार बदलते मौसम, नमी, बारिश और अभिषेक जल के कारण मंदिर परिसर के कई हिस्सों में दरारें और पत्थरों के जोड़ों की कमजोरी जैसी समस्याएं दिखाई देने लगी थीं। कुछ हिस्सों में पुराने सीमेंट पैच खराब हो चुके हैं, जबकि कई दीवारों और छतों में जल रिसाव भी देखा गया है। यदि समय रहते संरक्षण कार्य नहीं किया जाता, तो भविष्य में संरचनात्मक नुकसान और बढ़ सकता था।

वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण कार्य

इस परियोजना के तहत मंदिर परिसर की मरम्मत केवल सामान्य निर्माण कार्य की तरह नहीं होगी, बल्कि पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक अध्ययन और पुरातात्विक मानकों के आधार पर की जाएगी। विशेषज्ञ इस बात का विशेष ध्यान रखेंगे कि मंदिर की मूल वास्तुकला, प्राचीन स्वरूप और धार्मिक पहचान प्रभावित न हो। मंदिर की दीवारों, खंभों और पत्थरों की मजबूती की जांच आधुनिक तकनीकों से की जाएगी। जहां जरूरत होगी वहां संरचनात्मक मरम्मत और पुनर्स्थापन का काम किया जाएगा।

आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम

परियोजना के तहत गर्भगृह और अन्य हिस्सों से निकलने वाले अभिषेक जल के लिए आधुनिक वॉटरप्रूफ ड्रेनेज सिस्टम बनाया जाएगा। इसके निर्माण में विशेष रूप से बेसाल्ट पत्थरों का उपयोग किया जाएगा, ताकि मंदिर की पारंपरिक शैली बरकरार रहे। इसके अलावा बाहरी जल निकासी व्यवस्था को भी मजबूत किया जाएगा ताकि बारिश या जलभराव के कारण मंदिर की संरचना को नुकसान न पहुंचे।

पारंपरिक तरीके से सफाई

मंदिर की प्राचीन पत्थर संरचनाओं पर जमा काई और वनस्पतियों की सफाई के लिए रासायनिक पदार्थों का उपयोग नहीं किया जाएगा। विशेषज्ञों ने इसके लिए पारंपरिक और सुरक्षित तकनीक अपनाने का फैसला लिया है। अधिकारियों के अनुसार पत्थरों की सफाई के लिए हींग के ऑर्गेनिक घोल और नायलॉन ब्रश का उपयोग किया जाएगा। इससे मंदिर की प्राचीन सतह को नुकसान पहुंचाए बिना सफाई संभव हो सकेगी।

आधुनिक तकनीक का उपयोग 

परियोजना में मंदिर के कमजोर हिस्सों को मजबूत करने के लिए आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा। कोटि सरोवर कुंड, मंदिर की छतों और आरसीसी दीवारों में हो रहे रिसाव को रोकने के लिए उन्नत वॉटरप्रूफिंग तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। पुराने और खराब सीमेंट पैच हटाकर दरारों में चूना, सुर्खी और रेत के पारंपरिक मिश्रण से री-पॉइंटिंग और ग्राउटिंग की जाएगी। इससे प्राचीन संरचना की मूल शैली भी बनी रहेगी और मजबूती भी बढ़ेगी। वहीं कमजोर बीम और खंभों को मजबूत करने के लिए कार्बन फाइबर रीइन्फोर्स्ड पॉलिमर (CFRP) तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिसे आधुनिक निर्माण तकनीकों में काफी प्रभावी माना जाता है।

इंजीनियरों और पुरातत्व 

मरम्मत कार्य के दौरान पूरे परिसर में ट्यूबलर स्टील स्कैफोल्डिंग लगाई जाएगी ताकि ऊंचाई वाले हिस्सों में सुरक्षित तरीके से काम किया जा सके। क्षतिग्रस्त पत्थरों की जगह नए तराशे गए बेसाल्ट पत्थर लगाए जाएंगे, जिससे मंदिर का मूल स्वरूप बरकरार रखा जा सके। पूरा काम इंजीनियरों, संरक्षण विशेषज्ञों और पुरातत्व विशेषज्ञों की निगरानी में किया जाएगा। प्रशासन का कहना है कि परियोजना में गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

श्रद्धालुओं की सुविधा का ध्यान

महाकाल मंदिर देशभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जीर्णोद्धार कार्य के दौरान श्रद्धालुओं की दर्शन व्यवस्था प्रभावित न हो, इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा। काम चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा ताकि मंदिर में पूजा-पाठ और दर्शन की प्रक्रिया सामान्य रूप से चलती रहे। भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए अतिरिक्त व्यवस्थाएं भी की जा सकती हैं।

डेढ़ साल में पूरा होगा काम

प्रशासन ने इस पूरी परियोजना को 12 से 18 महीनों में पूरा करने का लक्ष्य रखा है। चूना और सुर्खी आधारित पारंपरिक क्योरिंग प्रक्रिया के कारण अलग-अलग चरणों में 7 से 14 दिनों का समय लग सकता है। यह परियोजना केवल मंदिर की मरम्मत तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए देश की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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