Diwali Puja: दीवाली की रात जब पूरा देश रोशनी से जगमगा रहा होता है, तब पूजा-पाठ का एक ऐसा दौर भी आता है जिसे शास्त्रों में सबसे रहस्यमयी और शक्तिशाली माना गया है—जी हाँ, हम बात कर रहे हैं 'निशीथ काल' की। अकसर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर दीवाली की आधी रात को ही माता लक्ष्मी के पृथ्वी भ्रमण और उनकी पूजा का इतना बड़ा विधान क्यों है, आइए इसके पीछे छिपे धार्मिक और आध्यात्मिक रहस्यों को बहुत ही सहजता से समझते हैं।
क्या है निशीथ काल और इसका समय?
सनातन परंपरा में रात के चार प्रहरों में से जो मध्य रात्रि का समय होता है, उसे निशीथ काल कहा जाता है। दीवाली की अमावस्या की रात को शास्त्रों में 'कालरात्रि' या 'महानिशा' की संज्ञा दी गई है।
- समय सीमा: आमतौर पर यह पावन समय रात्रि के 11:30 बजे से लेकर 12:30 बजे के बीच का होता है।
- ऊर्जा का प्रभाव: जानकारों और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, यह वह बेला होती है जब ब्रह्मांड और प्रकृति में एक बेहद खास और अलौकिक ऊर्जा सक्रिय होती है।
क्यों खास है आधी रात का यह पहर?
- पृथ्वी पर माता लक्ष्मी का भ्रमण: लोक-मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के मुताबिक, दीवाली की आधी रात यानी निशीथ काल में ही देवी लक्ष्मी गरुड़ पर सवार होकर पृथ्वी लोक का भ्रमण करने निकलती हैं। वे यह देखती हैं कि किस घर में साफ-सफाई, सकारात्मकता और उनके स्वागत के लिए दीप प्रज्वलित किए गए हैं। यही वजह है कि इस एक घंटे के दौरान घरों के दरवाजे और खिड़कियां हल्की खुली रखने या विशेष दीपक जलाने की परंपरा है, ताकि माँ का आगमन सहजता से हो सके।
- साधना और सिद्धि की अद्भुत रात: महानिशा की यह रात केवल धन की देवी लक्ष्मी ही नहीं, बल्कि मां काली और महासरस्वती की उपासना के लिए भी अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है। तंत्र और ज्योतिष शास्त्र यह मानते हैं कि इस खास घड़ी में किए गए मंत्र जाप, ध्यान या स्तोत्र पाठ का फल सामान्य दिनों के मुकाबले कई गुना अधिक शक्तिशाली होकर मिलता है।
इस समय पूजा का सीधा लाभ
अगर आप दीवाली की रात इस शांत और ऊर्जावान बेला (निशीथ काल) में पूरे विधि-विधान, श्रद्धा और ध्यान के साथ माता लक्ष्मी की आराधना करते हैं, तो ऐसा माना जाता है कि पूरे साल घर में बरकत और माँ की असीम कृपा बनी रहती है। यह समय सिर्फ कर्मकांड का नहीं, बल्कि एकाग्रचित होकर अपने भीतर सकारात्मक ऊर्जा को आमंत्रित करने का होता है।












