Diyaari Festival: भारत में दीपावली का त्योहार अलग-अलग समाजों में अपनी खास परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। सिंधी समाज में भी इस पर्व का विशेष महत्व है। यहां दीपावली को 'दीयारी' के नाम से जाना जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के साथ एक ऐसी अनोखी रस्म निभाई जाती है, जो लोगों का ध्यान खींचती है। पूजा संपन्न होने के बाद परिवार के सदस्य चांदी के सिक्के को अपने दांतों से हल्के से छुआते हैं। इस दौरान लक्ष्मी आई, दानत वाइ कहा जाता है। सिंधी समाज में सदियों से चली आ रही इस परंपरा को समृद्धि और सुख-समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है।
दीयारी पर होती है विशेष पूजा
सिंधी परिवारों में दीपावली के दौरान घरों में विशेष पूजा की तैयारियां की जाती हैं। कई परिवारों में दीवाली से भाई दूज तक 'हठालडी' स्थापित की जाती है। यह मिट्टी से बना एक छोटा मंदिरनुमा ढांचा होता है, जिसमें मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं रखकर पूजा की जाती है। पूजा के लिए एक विशेष थाली तैयार की जाती है। इसमें सिंदूर से स्वास्तिक और दूसरे शुभ चिह्न बनाए जाते हैं। सोने और चांदी के सिक्कों को कच्चे दूध से साफ करके थाली में रखा जाता है। इसके बाद चावल, फूल, सिंदूर और अन्य पूजन सामग्री से थाली सजाई जाती है।
चांदी के सिक्के को दांतों से छूने की क्या है मान्यता?
पूजा पूरी होने के बाद परिवार के सदस्य थाली में रखे सिक्कों में से एक सिक्का उठाते हैं और उसे अपने दांतों से हल्के से छुआते हैं। इस दौरान 'लक्ष्मी आई, दानत वाइ' शब्द बोले जाते हैं। सिंधी परंपरा में इस रस्म को मां लक्ष्मी के आगमन और घर में सुख-समृद्धि आने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इस परंपरा का भाव धन-संपत्ति की बरकत और आर्थिक खुशहाली से भी जुड़ा है। सिक्के को दांतों से छूने की यह रस्म सिंधी समाज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानी जाती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है।दीयारी पर बनते हैं खास पारंपरिक पकवान
सिंधी परिवारों में दीपावली का उत्सव पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहता। इस मौके पर घरों में कई पारंपरिक पकवान भी तैयार किए जाते हैं। इनमें साईं भाजी खास है, जिसे पालक और चने की दाल से बनाया जाता है। इसके अलावा सात तरह की सब्जियों से तैयार होने वाली सात भाजी भी पारंपरिक भोजन का हिस्सा है। इन व्यंजनों के साथ चावल परोसे जाते हैं। पूजा के बाद घरों में मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं और मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है। कई परिवारों में मान्यता के अनुसार रात के समय घर के मुख्य द्वार खुले रखे जाते हैं, ताकि देवी लक्ष्मी का आगमन हो सके। इस तरह सिंधी समाज की दीयारी केवल दीप जलाने और लक्ष्मी पूजन का पर्व नहीं है, बल्कि यह परिवार, परंपरा, आस्था और सांस्कृतिक विरासत को एक साथ जोड़ने का अवसर भी है।












