क्यों मनाया जाता है धनतेरस?
कौन हैं भगवान धनवंतरी और क्यों की जाती है उनकी पूजा?
धनतेरस मनाने की परंपरा के पीछे की पौराणिक कथा
धनतेरस के दिन यमराज की पूजा का भी विशेष विधान है, जिसके पीछे एक बहुत ही दिलचस्प और मार्मिक कथा जुड़ी हुई है:
कथा: प्राचीन काल में राजा हिमराज के यहाँ एक पुत्र का जन्म हुआ। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि विवाह के ठीक चौथे दिन ही इस राजकुमार की मृत्यु सांप के काटने से हो जाएगी। जब राजकुमार की शादी का दिन आया, तो उसकी पत्नी ने उसे मृत्यु के मुंह से बचाने के लिए एक अनोखी तरकीब निकाली। विवाह की चौथी रात को उसने अपने पति को सोने नहीं दिया और कमरे के दरवाजे पर ढेर सारे सोने-चांदी के आभूषण और रोशनी के लिए कई दिए जला दिए।
जब यमराज राजकुमार के प्राण लेने के लिए सर्प का रूप धारण कर अंदर आने लगे, तो कमरों की तेज रोशनी और चमक-धमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। इसके बाद यमराज राजकुमार के बिस्तर पर न बैठकर, बाहर ही बैठ गए और पूरी रात राजकुमार की पत्नी द्वारा गाए जा रहे मधुर लोकगीत और कहानियां सुनते रहे। सुबह होते ही यमराज को बिना प्राण लिए ही खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।
तभी से इस दिन को 'यम दीपदान' और धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा। मान्यता है कि जो परिवार इस दिन यमराज के नाम का दीया जलाता है, उसके घर में अकाल मृत्यु का भय कभी नहीं रहता।
किन देवी-देवताओं की होती है आराधना?
धनतेरस के पावन अवसर पर मुख्य रूप से तीन शक्तियों की पूजा की जाती है:
भगवान धनवंतरी: आरोग्यता और चिकित्सा के देवता।
माता लक्ष्मी: धन, वैभव और समृद्धि की देवी।
कुबेर देव: धन के संरक्षक और कोषाध्यक्ष।
इन तीनों की संयुक्त पूजा का संदेश यही है कि जीवन में केवल धन होना ही काफी नहीं है, बल्कि उस धन का आनंद उठाने और जीवन जीने के लिए 'निरोगी काया' (स्वास्थ्य) का होना भी उतना ही आवश्यक है।
धार्मिक कारण और आधुनिक संदर्भ
धार्मिक दृष्टिकोण से इस दिन किसी भी नई वस्तु—विशेषकर बर्तन, सोना, चांदी, या भूमि-भवन की खरीदारी को बेहद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तु में तेरह गुना वृद्धि होती है। इस परंपरा के पीछे जीवन में बरकत और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने की भावना छिपी है। संक्षेप में कहें तो, धनतेरस केवल खरीदारी का पर्व नहीं है, बल्कि यह अपने और अपने परिवार के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करने का एक पवित्र अवसर है।







