Bada Badua Daka: भारत में दीपावली का त्योहार अलग-अलग राज्यों में अपनी खास परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है। कहीं मां लक्ष्मी की पूजा होती है तो कहीं मां काली की आराधना की जाती है। घरों को दीपों से सजाने, रंगोली बनाने और मिठाइयां बांटने के बीच ओडिशा की एक ऐसी परंपरा भी है, जो इस पर्व को एक अलग पहचान देती है। ओडिशा में दिवाली की रात सिर्फ दीप जलाकर खुशियां नहीं मनाई जातीं, बल्कि परिवार के दिवंगत सदस्यों यानी पूर्वजों को भी याद किया जाता है। यहां बड़ बड़ुआ डाका नाम की सदियों पुरानी परंपरा निभाई जाती है। इस रस्म में जूट की सूखी लकड़ियों को जलाकर आसमान की ओर उठाया जाता है और पूर्वजों से अपने लोक लौटने की प्रार्थना की जाती है।
क्या है बड़ बड़ुआ डाका परंपरा?
ओडिशा में दीपावली की शाम इस परंपरा की शुरुआत होती है। परिवार का बुजुर्ग सदस्य घर की दहलीज पर खड़ा होकर सूखी जूट की डंडियों से बनी मशाल जलाता है। इन जलती हुई लकड़ियों को स्थानीय भाषा में ‘कौन्रिया काठी’ कहा जाता है। मशाल जलाने के बाद उसे आसमान की ओर उठाया जाता है। इस दौरान परिवार के सदस्य अपने पूर्वजों को याद करते हुए पारंपरिक प्रार्थना करते हैं। मान्यता है कि इस रोशनी के जरिए पितरों को उनके लोक लौटने का रास्ता दिखाया जाता है। बड़ बड़ुआ का अर्थ परिवार के दिवंगत बुजुर्गों या पूर्वजों से है, जबकि ‘डाका’ का मतलब पुकारना होता है। इस तरह इस परंपरा का भाव अपने पूर्वजों को याद करना और उन्हें सम्मानपूर्वक विदाई देना है।
लक्ष्मी पूजन से पहले क्यों याद किए जाते हैं पूर्वज?
ओडिशा की इस परंपरा के पीछे एक पुरानी धार्मिक मान्यता जुड़ी हुई है। माना जाता है कि दीपावली से पहले पितृपक्ष के दौरान पूर्वज अपने परिवार के बीच आते हैं और अमावस्या की रात उन्हें वापस पितृलोक लौटना होता है। इसी विश्वास के चलते दिवाली की अंधेरी रात में परिवार के लोग जूट की लकड़ियां जलाकर उनके लिए प्रकाश का मार्ग तैयार करते हैं। मान्यता है कि मशाल से निकलने वाली रोशनी पूर्वजों को उनके लोक तक पहुंचने का रास्ता दिखाती है। इस रस्म को पूरा करने के बाद ही परिवार के लोग मां लक्ष्मी की पूजा और दीपावली के दूसरे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।जगन्नाथ पुरी में भी दिखती है परंपरा की झलक
ओडिशा के घरों और धार्मिक स्थलों के आसपास इस परंपरा का विशेष महत्व देखने को मिलता है। पुरी में जगन्नाथ मंदिर के आसपास भी दीपावली की रात इस रस्म से जुड़ी गतिविधियां नजर आती हैं। यह परंपरा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार की पुरानी पीढ़ियों के प्रति सम्मान और जुड़ाव का प्रतीक भी है। दीपावली को रोशनी और खुशियों का पर्व माना जाता है, लेकिन ओडिशा की ‘बड़ बड़ुआ डाका’ रस्म यह याद दिलाती है कि इस उत्सव में अपने पूर्वजों को याद करने की परंपरा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।







