Chhath Puja: छठ पूजा केवल सूर्य उपासना का पर्व नहीं, बल्कि संतान की सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली और लंबी उम्र की कामना से जुड़ी एक विशेष धार्मिक परंपरा भी है। इस दौरान व्रती महिलाएं पूरे श्रद्धाभाव से छठी मैया और भगवान सूर्य की पूजा करती हैं। चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में व्रती करीब 36 घंटे तक निर्जला उपवास रखकर उगते और डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर देश के कई राज्यों में छठ पूजा की अलग ही रौनक देखने को मिलती है। घाटों पर गूंजते छठ गीत, पूजा की तैयारियां और सूर्य को अर्घ्य देने के लिए उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ इस पर्व की आस्था को दर्शाती है।
कौन हैं छठी मैया और क्यों की जाती है उनकी पूजा?
धार्मिक मान्यताओं में छठी मैया को षष्ठी देवी के नाम से भी जाना जाता है। उन्हें बच्चों की रक्षा करने वाली देवी और संतान सुख प्रदान करने वाली माता माना जाता है। मान्यता है कि छठी मैया नवजात शिशुओं को सुरक्षा प्रदान करती हैं और उनके अच्छे स्वास्थ्य तथा लंबी उम्र का आशीर्वाद देती हैं। हिंदू परंपरा में बच्चे के जन्म के छठे दिन षष्ठी देवी की पूजा करने का भी विधान है। इस दिन परिवार के लोग नवजात शिशु की सुख-समृद्धि और स्वस्थ जीवन के लिए प्रार्थना करते हैं। यही वजह है कि छठ पूजा के दौरान भी महिलाएं संतान की सलामती और परिवार की खुशहाली के लिए छठी मैया का व्रत रखती हैं।
भगवान सूर्य से क्या है छठी मैया का संबंध?
छठ पूजा में भगवान सूर्य और छठी मैया दोनों की आराधना की जाती है। प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, छठी मैया को सूर्य देव की बहन माना जाता है। इसी कारण इस पर्व में सूर्य को अर्घ्य देने के साथ छठी मैया की भी विशेष पूजा होती है। धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं में षष्ठी देवी को प्रकृति की छठी शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है। मान्यता है कि प्रकृति ने स्वयं को छह भागों में विभाजित किया था और उनका छठा अंश मातृशक्ति के रूप में पूजनीय हुआ। इसी देवी को षष्ठी माता कहा गया है। उन्हें ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी माना जाता है।क्या है छठी मैया की पौराणिक कथा?
छठी मैया से जुड़ी एक प्रचलित पौराणिक कथा राजा प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी से संबंधित है। कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत के पास सब कुछ था, लेकिन उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं था। इस बात से दुखी राजा ने महर्षि कश्यप की सलाह पर संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। कुछ समय बाद रानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह मृत पैदा हुआ। संतान प्राप्ति की खुशी कुछ ही पल में मातम में बदल गई। राजा और रानी अपने मृत पुत्र को देखकर बेहद दुखी हुए। कहा जाता है कि उसी समय वहां एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। उनका नाम देवसेना था। उन्होंने राजा-रानी को बताया कि वह ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं और सृष्टि की छठी अंश शक्ति हैं। इसके बाद देवी ने मृत शिशु को अपनी गोद में उठाया और उसे जीवनदान दे दिया।







